Hazrat Yunus AS Ka Waqia - मछली के पेट में 40 दिन का सफर
हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम को अल्लाह तबारक व ताला ने नबुव्वत अता फरमाई। इराक में नैनवा (Nineveh) नाम का एक शहर हुआ करता था, उस शहर के लोग आपकी उम्मत थे। हज़रत यूनुस (A.S) अपनी कौम में लगातार तब्लीग फरमाते रहे, लेकिन पूरी कौम बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) का शिकार थी। आपकी लगातार कोशिशों के बावजूद उनमें से कोई एक भी मुसलमान होने को तैयार नहीं था।
जब कोई ईमान नहीं लाया, तो आपने अल्लाह की बारगाह में अर्ज़ किया कि मौला ये मेरी कौम सुनती नहीं है। अल्लाह ने फरमाया कि अपनी कौम को अज़ाब की बशारत सुना दो कि 3 दिन के बाद एक खौफनाक अज़ाब आएगा और सब हलाक हो जाएंगे। कौम के बहुत से लोगों ने इस बात का मज़ाक उड़ाया। लेकिन जो अक्लमंद और बूढ़े लोग थे, उन्होंने कहा कि हमने आज तक यूनुस को कभी झूठ बोलते हुए नहीं सुना, अगर उन्होंने कहा है तो अज़ाब आ सकता है।
हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम अज़ाब का इंतज़ार किए बिना अपनी बस्ती छोड़कर दूर चले गए। जब 3 दिन गुज़रने लगे तो आसमान पर घने काले बादल छा गए, डरावनी शक्ल की बदलियां आ गईं और पूरी बस्ती में सन्नाटा छा गया। बस्ती वालों को यकीन हो गया कि अब अल्लाह का अज़ाब आने वाला है।
अज़ाब के डर से पूरी बस्ती के लोग (बच्चे, बूढ़े, जवान, औरतें) अपने घरों से निकलकर मैदान में जमा हो गए। उन्होंने रोना और गिड़गिड़ाना शुरू किया, अपने पुराने तमाम बुतों को खत्म कर दिया और अल्लाह की वहदानियत पर ईमान ले आए। उन्होंने अल्लाह से रो-रो कर तौबा की। अल्लाह ने उनकी तौबा कबूल फरमाई और जो अज़ाब आ चुका था, उसे टाल दिया और आसमान साफ हो गया।
जब हज़रत यूनुस (A.S) ने दूर से देखा कि अज़ाब टल गया है, तो उनके दिल में यह ख्याल आया कि अगर मैं वापस बस्ती में गया तो लोग मुझे झूठा कहेंगे। इसलिए वो बस्ती में जाने की बजाय एक लंबे सफर पर निकल पड़े। उन्होंने एक कश्ती (नाव) में सवारी की, लेकिन जब कश्ती बीच समंदर में पहुँची तो रुक गई और हिचकोले खाने लगी।
उस ज़माने में यह बात मशहूर थी कि अगर कोई भागा हुआ गुलाम कश्ती में हो तो कश्ती आगे नहीं बढ़ती। कश्ती वालों ने कहा कि लगता है इसमें कोई भागा हुआ गुलाम है। हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम ने कहा कि "हाँ, मैं ही वो गुलाम हूँ जो अपने रब से भाग कर आया हूँ"। लेकिन लोग उनकी शराफत देखकर उन्हें दरिया में डालने को तैयार नहीं हुए। फिर तीन बार قرعہ اندازی (लॉटरी/पर्चियां) डाली गई, और तीनों बार हज़रत यूनुस (A.S) का ही नाम निकला। आखिरकार उन्हें समंदर में डाल दिया गया।
समंदर में गिरते ही एक बहुत बड़ी मछली ने मुँह खोला और हज़रत यूनुस को निगल लिया। अल्लाह ने मछली को हुक्म दिया था कि "ये तेरी ग़िज़ा (खाना) नहीं है, बल्कि तेरा पेट मेरे नबी की अमानगाह (हिफ़ाज़त की जगह) है"। हज़रत यूनुस (A.S) 40 दिन तक मछली के पेट के उस घने अँधेरे में रहे।
उस भयानक अँधेरे में हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम ने अल्लाह को पुकारा और एक आयत पढ़ी: "ला इलाहा इल्ला अन्ता सुब्हानका इन्नी कुन्तु मिनज़ ज़ालिमीन"। अल्लाह को उनकी ये दुआ बहुत पसंद आई और अल्लाह ने फौरन उनकी दुआ कबूल फरमाते हुए उन्हें इस गम से आज़ाद कर दिया।
अल्लाह के हुक्म से मछली ने उन्हें समंदर के किनारे उगल दिया। 40 दिन मछली के पेट में रहने की वजह से उनका जिस्म बेहद कमज़ोर, सफेद और नह़ीफ़ हो चुका था। अल्लाह ने उनके सर के पास कद्दू की बेल पैदा फरमाई, जिसे खाकर उन्हें फौरी ताकत मिली। और एक हिरन वहाँ आती थी जो उन्हें दूध पिला कर चली जाती थी।
सेहतमंद होने के बाद जब हज़रत यूनुस (A.S) अपनी बस्ती वापस लौटे, तो सारी बस्ती वाले खुशी से दौड़ पड़े और उनके हाथों पर बैअत की। हज़रत यूनुस की कौम वाहिद ऐसी कौम है जो अज़ाब के आसार देखने के बाद भी तौबा करने पर माफ़ कर दी गई। बाज़ तफ़्सीरों में आता है कि हज़रत यूनुस की उम्मत को अल्लाह ने आज तक ज़िंदा रखा है, और जब इमाम मेहदी आएंगे तो ये उम्मत भी उनकी फ़ौज में शामिल होगी।