Jang e Khyber Ka Waqia - मौला अली और मरहब की जंग
आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फ़ाज़िल-ए-बरेलवी (R.A) ने इस रिवायत को नक़ल फरमाया है। हज़रत सलमा बिन अकवा से पूछा गया, "तुम्हें खौफ नहीं था, डर नहीं था? 400 लोगों को अकेले दौड़ाते चले गए, मदीने से बाहर भी चले गए।" तो जानते हैं कौन सी ताकत थी इनके पास जो उनको खौफ से आज़ाद कर रखी थी?
फरमाते हैं एक बार रसूलुल्लाह (S.A.W) सहाबा से बैअत ले रहे थे। हाथ में हाथ लेकर बैअत कर रहे थे। तो सब हुज़ूर के पास हाथ दे रहे थे, हुज़ूर ने मुझसे कहा, "सलमा बिन अकवा आ जाओ तुम बैअत कर लो मेरे हाथ पर।" मैंने अर्ज़ किया, "या रसूलुल्लाह, पहले ही मैं बैअत कर चुका हूँ।" एक बार वो बैअत कर चुके थे।
हुज़ूर ने फरमाया, "दोबारा कर लो इसमें क्या हर्ज है।" हज़रत सलमा बिन अकवा कहते हैं मैंने दोबारा हुज़ूर के हाथ में हाथ दिया। थोड़ी देर गुज़री थी, हुज़ूर ने फिर पुकारा, "सलमा बिन अकवा बैअत क्यों नहीं कर लेते?" कहा, "या रसूलुल्लाह मैंने दो बार बैअत की है।" हुज़ूर ने फरमाया, "तीसरी बार कर लो क्या हर्ज है।" अपना हाथ रसूलुल्लाह के हाथ में तीसरी बार दिया और उसके बाद मुझे इस हाथ पर इतना भरोसा था कि दुनिया की हर ताकत को धूल चटा सकता था।
अब खैबर पर हम आते हैं, खैबर क्या है? मदीना तय्यबा से तक़रीबन 320 किलोमीटर दूर, एक बस्ती है जिसको खैबर कहते हैं। खैबर यहूदियों का गढ़ है, यहूदियों का मरकज़। नबी-ए-पाक (S.A.W) की मदीना आमद से भी काफी पहले से, खैबर में यहूदियों ने अपना दबदबा जमाया हुआ था और पूरे अरब के सबसे बड़े मालदार यहूदी खैबर में रहते थे।
और जबसे नबी-ए-पाक (S.A.W) मदीने तय्यबा आए, इनकी दुश्मनी इतनी बढ़ गई थी कि जंग-ए-खंदक का सबब भी यही यहूदी थे। यहूदियों ने मक्का के काफिरों को, मुशरिकों को जमा किया था और पानी की तरह पैसा बहाया था। 12,000 लोगों को रसूलुल्लाह के खिलाफ इकट्ठा किया था।
मदीने में आबाद दो यहूदी कबीलों, बनू नज़ीर और बनू कुरैज़ा ने हुज़ूर (S.A.W) के साथ गद्दारी की थी। वादा खिलाफी की वजह से उन्हें मदीने से निकाल दिया गया था। तो जितने मदीने से निकाले हुए यहूदी थे वो सब खैबर में जाकर जमा हो गए थे। खैबर में उन्होंने अपना अड्डा बना लिया था और सिर्फ मोहम्मद (S.A.W) और उनके साथियों को खत्म करने की मंसूबा-बंदी करते थे।
इन लोगों ने देखा कि अब इस्लाम की ताकत बढ़ती जा रही है और बादशाहों तक इस्लाम पहुँच गया है। तो इन्होंने कबीला बनू गताफान (जो मुशरिकों का कबीला था और जंगी ताकत रखता था) के साथ मिलकर मदीने पर अचानक चढ़ाई करने का प्लान बनाया ताकि मदीने की ईंट से ईंट बजा दें।
रातों-रात प्लान बना, लेकिन मुखबिर-ए-सादिक रसूलुल्लाह (S.A.W) को खबर हो गई। दूसरे दिन हुज़ूर-ए-पाक (S.A.W) ने तक़रीबन 1600 सहाबा को जमा किया। 1600 सहाबा मदीना तय्यबा से निकल पड़े हुज़ूर के साथ, कि उन यहूदियों को खैबर से निकलने से पहले उनका रास्ता हम रोकेंगे।
यहूदियों ने सोचा था मदीने पर अचानक हमला होगा, लेकिन आठ दिन के बाद अचानक हुज़ूर खैबर पहुँच गए। सुबह-सुबह यहूदी अपने खेतों में काम करने जा रहे थे, जैसे ही मदीने की फ़ौज को देखा, हैबत तारी हो गई। उल्टे कदम अपने किलों में वापस भागते रह गए। हुज़ूर (S.A.W) ने फरमाया, "जिन काफिरों की वादी में हम उतर पड़े उनकी सुबह खराब हो ही जाती है।"
खैबर में आठ मशहूर किले थे। उन्होंने बहुत मज़बूत इमारतें बना रखी थीं, जिनका यकीन था कि कोई इन किलों को तोड़ नहीं सकेगा। आज 1400 साल गुज़र गए, अभी भी वो किले मौजूद हैं। आठ किलों में किला नईम, किला नतात और सबसे बड़ा किला कामूस शामिल था।
सबसे पहले किला नईम पर चढ़ाई शुरू की गई, जिसमें सारा ज़खीरा, खाना-पानी था। इसकी ज़िम्मेदारी सलाम बिन मश्कम नाम के एक यहूदी के पास थी जो बहुत ही बुग़्ज़ रखने वाला था। सहाबा-ए-कराम को सख्त गर्मी और प्यास का सामना करना पड़ा। कई सहाबा शहीद हुए, आखिरकार किला नईम फ़तेह हो गया।
आख़िरी जो किला था किला कामूस, ये सबके बस की बात नहीं थी। जो आदमी उसका सिपहसालार है वो मरहब है। पूरा अरब जानता था उसकी ताकत को, वो हज़ार इंसानों की ताकत रखता था। पहले दिन हज़रत अबू बक्र सिद्दीक (R.A) गए, दूसरे दिन हज़रत उमर-ए-फारूक (R.A) गए, लेकिन यहूदियों का डिफेन्स बहुत सख्त था।
ये मुहासिरा बढ़ता गया। 20 दिन चला कंटिन्यू मुहासिरा उन किलों का, लेकिन फ़तेह होने का नाम नहीं था। सहाबा 20 दिन से तपती हुई गर्मी में मदीने से 300 किलोमीटर दूर थे। रात का वक्त था, नबी-ए-करीम (S.A.W) जलाल में थे।
हुज़ूर-ए-अकरम (S.A.W) फरमाते हैं, "कल के दिन मैं अपना झंडा एक ऐसे आदमी को दूँगा जिससे अल्लाह और उसके रसूल मोहब्बत करते हैं! और अल्लाह और उसके रसूल जिससे मोहब्बत करते हैं वो खुद भी अल्लाह और उसके रसूल से मोहब्बत करता है! खैबर की फ़तेह उसी के हाथ में रखी हुई है!"
सहाबा कहते हैं पूरी रात बेचैनी में गुज़ारी। सुबह सारे सहाबा गर्दनें ऊँची कर-करके देख रहे थे। लेकिन नबी-ए-पाक (S.A.W) ने उस भरे मजमे में ऐलान फरमाया, "अली कहाँ हैं?" सहाबा ने कहा वो बुखार में हैं और आँखों में आशोब (इन्फेक्शन) है। हुज़ूर ने फरमाया उसी हालत में बुला लाओ।
नबी-ए-करीम (S.A.W) ने अपना लुआब-ए-पाक (मुबारक थूक) निकालकर उनकी आँखों में लगाया। हज़रत अली फरमाते हैं मुझे ऐसा लगा कभी आँखों में कोई मर्ज़ आया ही नहीं था। हुज़ूर ने परचम हैदर-ए-कर्रार के हाथ में दिया और कहा, "जाओ अली, तुम्हारे हाथ में अल्लाह ने फ़तेह रखी है।"
हज़रत अली करम अल्लाहु वजहहु करीम परचम लेकर किला कामूस के पास गए। सीधे हज़रत अली ने ललकार करके मरहब यहूदी को बुलाया। वो हाथी की तरह डोल-डौल रखता था। सामने आया और ललकार कर कहने लगा: "तुम्हें मालूम है पूरा खैबर मुझे जानता है कि मैं मरहब हूँ, मेरा वार कभी खाली नहीं जाता है।"
उसके जवाब में मौला अली फरमाते हैं: "तुझे पता है मेरी माँ ने ही मेरा नाम हैदर रखा है! हैबत-नाक शेर जो भूख की वजह से कछार में दहाड़ता है, उसको हैदर कहा जाता है।"
उसने हज़रत अली पर बहुत तेज़ वार किया, लेकिन वार खाली गया। पलट कर जब हैदर-ए-कर्रार ने वार मारी, तो उसकी लोहे की टोपी को काटता हुआ हज़रत अली की तलवार उसके जबड़ों तक आ गई। दूसरा वार भी नहीं पड़ा था कि मरहब ज़मीन पर ढेर हो कर तड़पने लग गया।
ये मंज़र देखकर सारे यहूदी हैदर-ए-कर्रार पर टूट पड़े। हज़रत अली ने अपना डिफेन्स करने के लिए किला कामूस के दरवाज़े का जो फाटक था, एक हाथ से उखाड़ दिया! एक हाथ में दरवाज़ा लेकर ढाल बनाए हुए हैं और सीधे हाथ से तलवार से हमला कर रहे हैं। जिस फाटक को 20 दिन से सहाबा तोड़ न सके थे, उसे उखाड़ दिया।
ये वही हैदर-ए-कर्रार हैं जब 9 साल के थे तो रसूलुल्लाह ने उन्हें सीने से लगाकर उनके लिए दुआ की थी। वो 9 साल का बच्चा जब 25 साल का हो गया तो फ़ातेह-ए-खैबर बन कर निकला! ला फता इल्ला अली, ला सैफ इल्ला ज़ुल्फ़िकार।
खैबर फ़तेह हुआ। यहूदियों को पता था एक बार अली इसमें दाखिल हो गया तो क़यामत तक खैबर हमारे हाथ में न आ सकेगा। 2018 में लन्दन की सड़कों पर यहूदी एहतेजाज कर रहे थे कि खैबर हमारा था। उन्होंने ग्रेटर इज़राइल का जो नक्शा बनाया है उसमें खैबर भी शामिल किया है। लेकिन इंशा-अल्लाह ऐसा कभी नहीं होगा!
खैबर फ़तेह होने के बाद नबी-ए-करीम (S.A.W) ने यहूदियों को माफ़ कर दिया। यहूदियों ने कहा हम खैबर छोड़कर जाना नहीं चाहते, साल भर में जितनी फसल होगी उसका आधा हम मदीने पहुँचा देंगे। हुज़ूर ने सब माफ़ कर दिया और खैबर उनके हवाले कर दिया।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा (R.A) जब आधा हिस्सा लेने जाते, तो पूरा माल बराबर बाँट कर यहूदियों से कहते जो हिस्सा तुम्हें पसंद है वो रख लो। यहूदी कहते ऐसा अदल हमने कहीं देखा ही नहीं। लेकिन इसके बावजूद यहूदियों ने हुज़ूर (S.A.W) के साथ धोखा किया।
ज़ैनब नाम की एक खातून ने हुज़ूर (S.A.W) की दावत की और गोश्त में निहायती खतरनाक ज़हर मिलाया। हुज़ूर ने जैसे ही पहला लुक़्मा उठाया, बोटी खुद बोल पड़ी कि मुझमें ज़हर मिला हुआ है। हुज़ूर ने उसे निकाल कर फेंक दिया।
नबी-ए-करीम (S.A.W) को ज़हर के असर से कुछ नहीं हुआ। हुज़ूर ने उस यहूदी खातून को बुलाया, उसने इकरार कर लिया। हुज़ूर (S.A.W) ने उस खातून से बदला नहीं लिया, उसे माफ़ कर दिया अपनी ज़ात के लिए हुज़ूर ने कभी बदला लिया ही नहीं।
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✍️ Written By: Mufti Salman Azhari
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