Shab-E-Meraj Ka Waqia - और उसकी फ़ज़ीलत
हादीसे करीमा से साबित है कि जब अल्लाह ताला ने अपने महबूब सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम को आसमानों का सफर कराया। इसी को मेराज कहा गया है मेराज का सफर तीन मरहलों में हुआ है तीन मंज़िलें मरहले नहीं तीन मंज़िलें पहली मंज़िल तो कुराने पाक से साफ़ साबित है उसका इंकार जाइज़ ही नहीं है अल्लाह ने फ़रमाया पाक है वो ज़ात जिसने अपने बंदे ख़ास को रात के एक हिस्से में मस्जिदे हरम से मस्जिदे अक़्सा तक का सफर कराया ये क़ुराने पाक से साबित है ये सफर मस्जिदे हरम से लेकर मस्जिदे अक़्सा तक का सफर। मस्जिदे अक़्सा बैतुल मुक़द्दस को कहते हैं।
दूसरा सफर है बैतुल मुक़द्दस से लेकर आसमानों का सफर। जिसमें पहला आसमान दूसरा आसमान तीसरा चौथा पांचवां छठा सातवां आसमान हत्ता के सिदरतुल मुंतहा तक का सफर जिसमें जिब्राईल अमीन अलैहिस सलाम साथ रहे। ये दूसरा दूसरी मंज़िल है। जिसमें बुर्राक़ की सवारी के साथ मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जिब्राईल अमीन के साथ साथ रहे।
तीसरा सिदरतुल मुंतहा के बाद जिब्राईल अमीन अलैहिस सलाम भी अलग हो गए और बुर्राक़ सवारी भी अलग हो गई। और फिर ये दोनों हट गए सिर्फ तन्हा मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लामकां का सफर किए। ये तीसरी मंज़िल है। यहां सिवाए मेरे नबी के किसी दूसरे की वहां पर शिरकत हुई ही नहीं। बस वो कौन सी जगह थी उस जगह का नाम ही नहीं है। जिसको लामकां कहा गया अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की तरफ से आवाज़ आती रही उदनु मिन्नी या अहमद ऐ अहमद मुझसे करीब होते जाओ करीब होते जाओ। मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बढ़ते गए बढ़ते गए सूरे नज़्म में अल्लाह ताला ने इस वाक़िए को यूं फ़रमाया फकाना काबा कौसैनी औ अदना तो महबूब और मुहिब अल्लाह और उसके रसूल के बीच इतना फासला रह गया था जैसे के दो कमानों के बीच में फासला रहता है। मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम की आज की रात मेरे मौला से कुर्बत की रात है। रब ताला ने वो हसीन सआदत मेरे नबी को अता फरमाई जो कायनात में किसी और को अता हुई भी नहीं और कयामत तक होगी भी नहीं। सिर्फ तन्हा एक ज़ात है मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जिन्होंने अपने माथे की आंखों से सरापा ज़ात का दीदार फरमाया है। इसीलिए आला हज़रत फाज़िले बरेलवी रदियल्लाहु ताला अन्हु ने फरमाया कोई ग़ैब क्या तुमसे निहां हो भला जब ना ख़ुदा ही छुपा तुमपे करोड़ों दुरूद।
अब यहां से मैंने ये तीन मंज़िलें आपको बताई एक मस्जिदे हरम से मस्जिदे अक़्सा तक ये कुराने पाक खुद बयान कर रहा है दूसरी मंज़िल है बैतुल मुक़द्दस से सिदरतुल मुंतहा तक तीसरी मंज़िल है सिदरतुल मुंतहा से लामकां अपने रब्बे ज़ुलजलाल के कुर्बो जवार तक की।
अब ये सफर कितने महीनों का था कितने सालों का था कितनी सदियों का था पता नहीं क्योंकि एक आसमान से दूसरे आसमान के बीच का फासला ही फ़रमाया गया कि अगर तेज़ रफ़्तार कोई सवारी दौड़े तो 500 साल के बाद पहुंचेगी एक आसमान से दूसरे आसमान के बीच इस तरह के सात आसमान फिर उसके बाद सातवें आसमान के बाद सिदरतुल मुंतहा उतनी ही ऊपर सिदरतुल मुंतहा के बाद फिर कौन से मकानात हैं वो अल्लाह जाने और उसका महबूब जाने।
फिर जन्नत का और दोज़ख़ का नज़ारा फ़रमाया अर्श कुर्सी लौह क़लम सब मेरे आक़ा ने दीदार किए उसके बाद फिर वापस तशरीफ़ लाए अल्लाह के हबीब सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम इसी रात को गए थे आज की रात और इसी रात को वापस भी आए इसीलिए शायर ने कहा है कि ज़ंजीर भी हिलती रही बिस्तर भी रहा गरम ज़ंजीर भी हिलती रही बिस्तर भी रहा गरम ता अर्श गए फिर आए मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हुज़ूर गए भी और आए भी।
ऐ मेरे अज़ीज़ो आज दुनिया थम सी गई है इसी तरह से मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम जब मेराज के सफर पर गए थे तो कायनात जहां थी वहीं रुकी की रुकी रह गई क्यों कायनात की जान हैं मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब जान-ए-कायनात को रब ताला ने कायनात से अपने कुर्ब में बुलाया तो ये जो टाइम था ये जो वक़्त चल रहा था जहां से मेरे नबी गए वहीं पर रुक गया था अब अल्लाह बेहतर जाने हुज़ूर के इस सफर में कितने साल लगे कितनी सदियां लगी कितने महीने वापस जब मेरे आक़ा तशरीफ़ लाए तो जहां से वक़्त रुका था वहीं से फिर चलने लगा इसीलिए शबे मेराज एक ही रात में हुई है ऐसा नहीं कि कई रातें इसके लिए हो गईं कई महीने लग गए नहीं एक ही।
अब यहां पर चंद ऐतराज़ात के जवाबात भी मैं आपको बता दूं। बाज़ लोग आज के ज़माने में भी ये कहते हैं कि हुज़ूर सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम को ख्वाब में हुई थी मेराज ख्वाब में मेराज हुई थी जबकि अहले सुन्नत व जमाअत का मुत्तफका अक़ीदा ये है कि हुज़ूर जिस्म के साथ गए थे हुज़ूर जिस्म के साथ गए थे ख्वाब की बात नहीं है।
अब सुनिए क्या दलील है ख्वाब में गए थे उनके पास तो वो अक़्ली दलील पर चलते हैं कि इतना लंबा सफर तो मुमकिन ही नहीं है ये ख्वाब में है अब आप कहते हैं कि नहीं हुज़ूर जिस्म के साथ गए थे तो सबसे बड़ी दलील तो ये है कि जब मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम इस सफर से आए थे वापस दूसरा दिन आया दूसरे दिन हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मक्का वालों को अपने सफर की दास्तान सुना रहे थे।
क्या क्या सुना रहे थे मैं यहां से बैतुल मुक़द्दस गया बैतुल मुक़द्दस में नबियों की इमामत फरमाई और उसके बाद आसमानों का सफर किया अपने रब से मुलाक़ात की और फिर वापस आ गया जिसे मानना था उन्होंने मान लिया जिसे कुछ पूछना था उन्होंने पूछ भी लिया जिसे नहीं मानना था उन्होंने सीधे क्या कहा ये तो झूठी बातें हैं मनघड़त बातें हैं मआज़ल्लाह तो वहां से कुछ लोग अपनी बगलें खुजाते निकल गए।
अब सवाल ये है मियां मैं आपसे पूछता हूं अगर मैं ख्वाब में ये कह दूं कि कल रात ख्वाब में मैं सऊदी गया था दुबई गया था तो क्या आप सुबह मेरे ख्वाब का इंकार करेंगे भाई ख्वाब में कोई कहीं पर भी जाए तो मक्का के कुफ्फ़ार ओ मुश्रिकीन को हुज़ूर अगर ख्वाब ही बयान कर रहे थे कि मैं बैतुल मुक़द्दस गया था तो किसी मक्का वाले को इंकार करना ही नहीं चाहिए था उनका इंकार करना इस बात की दलील है कि हुज़ूर ने ख्वाब नहीं सुनाया अपने जिस्म का सफर सुनाया था उन्होंने अपने जिस्म का सफर सुनाया था इंकार उन काफिरों का इस बात की दलील है कि मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम अपने ख्वाब की बात नहीं बता रहे थे।
मियां तुम ख्वाब की बात कर रहे हो ये तो मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम को ज़िंदगी-ए-पाक में जिस्म के साथ एक बार मेराज हुई ख्वाब की तो तादाद ही नहीं कि कितनी बार हुई खुद मेरे आक़ा फरमाते हैं कि युतइमुनी रब्बी व युसकीनी मिनल जन्नती व अना नाइमुन जब भी मैं सोता हूं मेरा रब जन्नत से मुझे खिलाता पिलाता है तो मेरे हुज़ूर की हर नींद जो है मेराज है वो अपने रब तबारक व ताला के हुज़ूर पहुंचते ख्वाब की बात तो है ही नहीं अगर ख्वाब वाली मेराज की बात कहें तो हुज़ूर सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम की तो वैसे रोज़ मेराज थी जिस्म के मेराज की बात थी।
तो वो शबे मेराज आज की ये रात छब्बीसवीं रजब के बाद सत्ताईसवीं जो शब आई अज़ीज़ाने गिरामी वक़ार ये मेराज के सिलसिले में जो अल्लाह तबारक व ताला ने मेरे नबी को जिस शान से बुलाया आयतें पढ़ो तो समझ में आता है देखें अल्लाह अपने हबीबे पाक सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम का कैसे सफर का एहतेमाम फरमा रहा है।
पहली तो बात ये है कि इसी रात को क्यों हुई उसके मुताल्लिक मुफस्सिरीन फरमाते हैं कि हुज़ूर को आज ही की रात मेराज क्यों हुई आज अल्लाह ने अपने पास क्यों बुलाया हुआ ये था कि मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम रोज़ाना इस्लाम की तब्लीग फरमाते तो कोई ना कोई इस्लाम ज़रूर क़ुबूल करता लेकिन आज का दिन पूरा मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम का ऐसा गुज़रा कि हुज़ूर की दावत पर एक ने भी इस्लाम क़ुबूल नहीं किया और अल्लाह के हबीब सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम को सबसे बड़ा ग़म इसी बात का होता कि अगर कोई ईमान ना लाए तो हुज़ूर को बड़ी तकलीफ़ होती।
मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम ग़मगीन हो गए यहां तक कि अपने घर में नहीं गए उम्मे हानी के घर गए दरवाज़ा बंद किया ग़म इतना था कि हुज़ूर सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम किसी से बात भी नहीं फरमा रहे थे कहा दरवाज़ा बंद करो और मैं आराम करता हूं कबीदा खातिर थे मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब लोगों को मना कर दिया हत्ता कि एक रिवायत में हज़रते फातिमा को दरवाज़े पर खड़ा कर दिया कि किसी को आने ना देना किसी से मुलाक़ात नहीं करनी आज ये रात आज मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम ग़मगीन हो कर के सोए।
मियां हम और आप जब ग़मगीन होते हैं तो सोचते हैं कि कोई तफरीह कर लें कहीं पर चहलकदमी कर लें जा कर के टहल कर के आ जाएं ताकि दिल बहल जाए लेकिन अल्लाह का महबूब जब ग़मगीन होता है तो मौला ताला उनके दिल बहलाने के लिए सीधे उन्हें जन्नत के नज़ारे करवाता है उन्हें जन्नत की तरफ बुलाता है आओ महबूब तुम्हारा दिल आज मलूल है आज तुम्हारा ग़म का ये ग़म की तुम्हारी कैफ़ियत अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त को गवारा नहीं है सफरे मेराज पर बुलाया किस अंदाज़ से बुलाया।
जिब्राईल अमीन को भेजा वो भी इस तरह से कि जिब्राईल जा कर सीधे जगा ना देना बल्कि अपनी पेशानी महबूब के क़दमों पे लगाना हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम जिब्राईल अमीन के आते ही क़दमों पर ठंडक महसूस किया बेदार हुए पूछा क्या बात है जिब्राईल इस तरह का आना हुआ जिब्राईल अमीन ने अर्ज़ किया आक़ा रब तबारक व ताला आपको अपने कुर्ब में बुला रहा है दावत आई है।
अल्लाह के हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उठे वहां से मस्जिदे हरम में गए मस्जिदे हरम में जाने के बाद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का सीना मुबारका चाक किया गया और उसके बाद आपका कल्बे मुबारक निकाल कर ज़मज़म के पानी से जिब्राईल अमीन ने धोया उसमें कुछ तश्त से वो जन्नत से कुछ चीज़ें लाई थीं वो उंडेल दिया हुज़ूरे पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के कल्बे मुबारक को फिर सीने पर रखा गया इसको शक्के सदर कहते हैं और उसके बाद फिर एक सवारी थी जिब्राईल अमीन जो साथ लेके आए थे जिसको बुर्राक़ कहते हैं हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से आपने अर्ज़ किया आक़ा इस सवारी पर सवार हो जाएं।
कहां के लिए कहा अब आप आसमानों का सफर करेंगे इस सवारी पर सफर होने के हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जिब्राईल अमीन ने जो सवारी पर चढ़ने का अरीज़ा पेश किया ये बुर्राक़ के मुताल्लिक रिवायत में है जहां तक नज़र जाती है वहां उसका पहला कदम पड़ता था यहां से अगर तुम आसमान तक देख रहे हो तो उसका पहला कदम उसकी रफ़्तार अंदाज़ा नहीं कर सकोगे करंट से भी ज़्यादा तेज़ रफ़्तार बुर्राक़।
उस सवारी पर मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम सवार हुए और उसके बाद यहां से ले कर के जिब्राईल अमीन कहां गए सीधे बैतुल मुक़द्दस गए...
बैतुल मुक़द्दस में मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं मैंने देखा पहले से वहां अम्बिया इकराम की सफें लगी हुई थीं आदम अलैहिस सलाम से ले कर के ईसा अलैहिस सलाम तक हुज़ूर तक जितने भी नबी आए सब के सब नबी बैतुल मुक़द्दस में जमा थे।
मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम उन नबियों के बीचों बीच जब तशरीफ़ ले गए तो सबों ने मेरे आक़ा को आगे मुसल्ला-ए-इमामत पर बढ़ाया अल्लाह के हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब मुसल्ला-ए-इमामत पर खड़े हुए तो हज़रते इब्राहीम अलैहिस सलाम खड़े हुए और सारे नबियों को एक खुत्बा दिया जिसमें मेरे नबी की शान बयान की और उसके बाद फिर उनके बाद हज़रते मूसा अलैहिस सलाम खड़े हुए फिर अक्सर अम्बिया इकराम ने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में खुत्बे बयान किए अपने अपने कसीदे बयान किए फिर मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम ने उन नबियों की इमामत फरमाई उन नबियों की इमामत फरमाई वही अव्वल वही आख़िर वही ज़ाहिर वही बातिन वही कुराआं वही फुरक़ां वही ताहा वही यासीं मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम वो अव्वल भी हैं आख़िर भी हैं सारे नबियों के इमाम वही हैं।
अज़ीज़ाने गिरामी रसूले पाक सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम यहां से फिर आसमानों का सफर किए इतने से मुख्तसर सफर के लिए अल्लाह ने जो लफ़्ज़ बयान फ़रमाया मैं आपको उसको बड़े प्यारे अंदाज़ में अर्ज़ किया है हकीमुल उम्मत अल्लामा अहमद यार खां नईमी रहमतुल्लाह अलैह ने पंद्रहवें पारे की शुरू की आयत सुभानल्लज़ी ये सफर का लफ़्ज़ कहां से शुरू होता है सुभानल्लज़ी सुभान कहते हैं पाक है वो ज़ात पाक है वो ज़ात हकीमुल उम्मत ने इस सफर को यूं बयान किया कि ऐ लोगो देखो मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम की वो कैफ़ियत जो थी उस दिन की वो दूल्हे की कैफ़ियत थी।
हुज़ूरे पाक सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम को लेने के लिए जिब्राईल आए सवारी बहुत आला किस्म की लाई और फिर ग़ुस्ल ज़मज़म से दिया आपके कल्बे मुबारक को बारातियों की शक्ल में अम्बिया इकराम की जमाअत खड़ी है अब जब दूसरे लोग अपने घर से निकलते हैं दूल्हा आप भी बने होंगे हम भी बने होंगे अपने घर से जब निकलते हैं लिबास पहनते हैं सारी चीज़ें और शायद हो सकता है कुछ लोग घोड़ियों पर बैठते हैं या कार में बैठने का ज़माना है कार में बैठते हैं अपने घर से जब निकले सवारी पर तो कभी मां आती है बलाएं लेती है बाप आता है और कहता है माशाअल्लाह क्या मेरा बेटा लग रहा है नज़र उतारते हैं मेरे अज़ीज़ो वो दुर्रे यतीम मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम जिनको बुलाया गया कि सवारी पर सवार हो कर के आओ।
आसमानों पर पहुंचे पहले आसमान पर ये लंबी तफ़्सील है वहां पर आदम अलैहिस सलाम से आपकी फिर मुलाक़ात हुई वहां फिर दूसरे आसमान पर दूसरे नबी से तीसरे आसमान पर जो नबी यहां बैतुल मुक़द्दस में थे हुज़ूर की इमामत में नमाज़ पढ़ चुके फिर वो वहां पहुंचे हुए थे।
अब एक सवाल आता है कि आप कहते हैं कि बैतुल मुक़द्दस में हुज़ूर ने सारे नबियों को नमाज़ पढ़ाई और फिर यहां से निकले पहले आसमान में आदम अलैहिस सलाम से मुलाक़ात हुई दूसरे आसमान में नूह अलैहिस सलाम से तीसरे आसमान में इदरीस अलैहिस सलाम चौथे आसमान में हज़रते ईसा अलैहिस यूसुफ अलैहिस सलाम तीसरे आसमान में चौथे आसमान में ईसा अलैहिस सलाम इस तरह अम्बिया इकराम से मुलाक़ात करते रहे मुझे ये बताएं कि ये अम्बिया हुज़ूर से पहले कैसे गए वहां पर वो तो यहां पर इमामत में जमाअत में थे तो हुज़ूरे पाक सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम की इस इमामत में जमाअत में वो शरीक भी रहे उसका जवाब मुफस्सिरीन ने यूं फ़रमाया बात दरहकीक़त ये है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम दूल्हे की शक्ल में थे और दूल्हे की सवारी बड़ी आराम से जाती है और बारातियों को इंतज़ाम के लिए कभी पहले पहुंचना होता है तेज़ी से वो जा कर के इस्तकबाल के लिए खड़े हो जाते हैं।
तो हुज़ूर की वो बुर्राक़ की सवारी पूरे अपनी रफ़्तार से नहीं बल्कि वो अपनी शान के साथ जैसे दूल्हे को ले जाती है इस तरह से वो जा रही थी और अंदाज़ा करो वो अम्बिया इकराम की रफ़्तार उतनी है तो फिर अगर मेरे नबी की पूरी रफ़्तार ज़ाहिर हो जाए तो उस रफ़्तार को कौन पा सकेगा अज़ीज़ाने मोहतरम हुज़ूरे पाक सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम के मेराज के सफर की गुत्थियां सुलझाना मामूली बात नहीं है सीधे इसका जवाब एक ही है बाज़ लोग अगर कन्फ्यूज़न हैं कि इतना लंबा सफर बैतुल मुक़द्दस में इतने नबियों से मुलाक़ात सातों आसमान ये सब चीज़ें नहीं समझ में आता अकल में नहीं आती बात बहुत सारे लोग ये समझते हैं।
पहली बात तो ये है कि मुसलमान अगर ऐसी बात कहे तो उसे समझा दें मियां ये मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मोज़िज़ा है मोज़िज़ा उसको कहते हैं जो आम लोगों की अकल में ना आए अगर तेरी अकल में आ जाता तो वो मोज़िज़ा कैसे होता हुज़ूर सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम ने उंगली के इशारे से चांद के टुकड़े किए ये तेरे ज़हन में आ गया समझ में आया कोई कर सकेगा हुज़ूर ने डूबे हुए सूरज को पलटाया क्या ये तुम्हारी समझ में आ गया हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी उंगलियों के बीच से पानी के फव्वारे जारी फरमाए क्या ये तुम्हारी समझ में आ गया।
तो जब ये मोज़िज़ात समझ में नहीं आए तो मेराज कैसे समझ में आएगी यहां पर सिर्फ सिद्दीक का वो ईमान चाहिए हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु ताला अन्हु को जब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ये सुनाया मेरे अज़ीज़ो हुज़ूर सैय्यदुना अबू बकर सिद्दीक ने हुज़ूर से पहले नहीं सुना इस वाक़िए को अबू जहल से पहले सुना उन्होंने आप सफर से आ रहे थे अबू जहल बीच रास्ते में पकड़ लिया और कहा अबू बकर एक शख़्स मक्का में आया यूं यूं कह रहा है कि रात को यहां से फिलिस्तीन गया था बैतुल मुक़द्दस फिर वापस आ गया आसमानों की बात उसने नहीं की।
अबू जहल ने हज़रते अबू बकर को पकड़ के अबू बकर सिद्दीक से पूछा क्या ऐसा हो सकता है हज़रते अबू बकर ने कहा ऐसा एक रात में कौन जा के आ सकता है नहीं हो सकता तो ठाटे मार कर के ठट्ठा मार कर के हंसने लगा कहा देख मैं कहता नहीं था कि वो ऐसी ही बकवास करता है मआज़ल्लाह रब्बिल आलमीन हुज़ूर के बारे में ऊल फोल बकने लगा और कहा अबू बकर ये कोई और नहीं मुहम्मद कह रहे हैं।
हज़रते अबू बकर सिद्दीक जलाल में आए कहा ओ कमबख्त अगर वो इससे भी बड़ी बात कहेंगे तब भी मैं यक़ीन करूंगा तू तो यहां से बैतुल मुक़द्दस की बात कर रहा है वो इससे भी बड़ी बात करेंगे तो मैं ईमान ले आऊंगा अगर उन्होंने कहा ये ईमान होना चाहिए मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जब फरमा दिया मैंने सफर किया तो तुम अपनी अकल के घोड़े मत दौड़ाओ कि कैसे किया होगा तुम अपने ऐतबार से उन्हें सोच नहीं सकते।
हम जो चीज़ें कर रहे हैं इसके ऊपर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को नाप नहीं सकते ये बात समझ कर के चलें अल्लाह के नबी की ज़ात और है तुम आम इंसानों की ज़ात और है उसके अलावा सबसे बड़ी बात तो ये है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम खुद गए थोड़ी ना हैं खुद गए थोड़ी ना हैं तुम अगर मेराज का इंकार कर रहे हो तो गोया कि अल्लाह का इंकार कर रहे हो अल्लाह फरमा रहा है मैं ले गया अल्लाह ले गया है तो जिसमें रब तबारक व ताला ये फरमा रहा है कि पाक है वो ज़ात जो अपने बंदे ख़ास को ले गया तो अल्लाह ले गया है तो तुम्हें दर्द किस बात का क्या अल्लाह ताला की भी कुदरत का इंकार करते हो रब तबारक व ताला की ताक़त का भी इंकार करते हो।
आज वो बदबख्त लोग जो बदअकीदा हैं मेरे आक़ा के मेराज के सफर का इंकार करते हैं उनके लिए मैं कह रहा हूं जिसने हुज़ूर के मेराज के सफर का इंकार किया उसने खुदा की शान और उसकी कुदरत का इंकार किया क्योंकि अल्लाह ने फरमाया अल्लाह ले गया है तो तुम्हें इस बात का क्या दर्द है कि अल्लाह जिसे जहां चाहे ले जाए।
अब सुनिए इस सफरे पाक की और आख़िरी बातें मैं आज मुख्तसर करता हूं इस चीज़ को रसूले पाक सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम जब यहां से निकले सातवें आसमान तक सिदरतुल मुंतहा ये ख़ाने काबा के ऊपर हज़रते जिब्राईल अलैहिस सलाम का वो मक़ाम आख़िरी मक़ाम एक बैतुल मामूर भी है ऊपर बहुत सारी चीज़ें हैं वो अभी बयान में ला नहीं सकूंगा जिब्राईल अमीन वहां पहुंच कर के कहने लगे या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अब इसके आगे मैं नहीं जा सकूंगा मेरी हद यहीं तक की है मुझे यहीं तक आने की इजाज़त है वो जिब्राईल जो सैय्यदुल मलाइका हैं सारे फरिश्तों के सरदार हैं हज़रते जिब्राईल अलैहिस सलाम अगर अपनी असली शक्ल में आएं तो ये पूरी दुनिया सिर्फ उनके परों से भर जाएगी इतने ताक़तवर फरिश्ते बाकी सारे फरिश्तों की बात अलग है हज़रते जिब्राईल अलैहिस सलाम की बात अलग वो ताक़तवर ताक़त बहुत ही पावरफुल फरिश्ता हज़रते जिब्राईल अलैहिस सलाम जिनकी रफ़्तार को नहीं जान सकते आप अंदाज़ा करो कि इब्राहीम अलैहिस सलाम अपने बेटे इस्माईल अलैहिस सलाम की गर्दन पर छुरी रख चुके हैं छुरी रख चुके हैं और छुरी के चलने में कितना टाइम लगता है सेकंडों में भी नहीं छुरी यूं रखी यूं चलाना है उस चलाने से पहले जिब्राईल अलैहिस सलाम जन्नत से ज़मीन तक आ चुके थे ये रफ़्तार जिब्राईल अमीन की है।
तवज्जो चाहता हूं जिब्राईल की ताक़त क्यों मैं बता रहा हूं अर्ज़ करता हूं यूसुफ अलैहिस सलाम को उनके भाइयों ने कुएं में फेंका वाक़िया मालूम है हज़रते यूसुफ अलैहिस सलाम को उनके भाइयों ने यूं पकड़ा और कुएं में यूं धकेल दिया कुआं बहुत बड़ा भी नहीं था बहुत बड़ा भी नहीं था लेकिन एक चीज़ को जब ऊपर से गिराया जाए तो कितनी देर में वो कुएं में गिरेगी घंटा लगेगा उसको मिनट लगेंगे सेकंड भी नहीं लगेंगे उसमें भी हदीसे पाक है यूसुफ अलैहिस सलाम को उनके भाइयों ने ऊपर से धक्का दिया यूसुफ अलैहिस सलाम कुएं के ऊपरी हिस्से पानी पर आने से पहले जिब्राईल अमीन जन्नत से नीचे आ चुके थे और अपने हाथों से उन्हें पकड़ कर के एक कोने पर बिठा भी चुके थे इब्राहीम अलैहिस सलाम को नमरूद ने आग में फेंका मिंजनीक में डाल कर के फेंका और वो इतनी तेज़ तोप यहां से उड़े तो फौरन उधर जाए बंदूक की गोली इब्राहीम अलैहिस सलाम को आग के ऊपर जैसे ही डाला गया मेरे ख़्याल से वो सबसे तेज़ रफ़्तार की मिंजनीक थी उस ज़माने की इब्राहीम अलैहिस सलाम आग में पहुंचे भी नहीं थे उस वक़्त जिब्राईल अमीन अलैहिस सलाम अपने रब से बात कर रहे हैं उस वक़्त सिदरतुल मुंतहा पे सिदरतुल मुंतहा पे अल्लाह से बात कर रहे हैं जब इनको मिंजनीक से फेंका गया रब ने फरमाया जिब्राईल जाओ मेरे बंदे से पूछो कि कोई हाजत है उनके आग में पहुंचने से पहले ही जिब्राईल अमीन आ चुके थे आग के पास कितनी तेज़ रफ़्तारी समझ गए।
उस तेज़ रफ़्तारी का बादशाह सैय्यदुल मलाइका जिब्राईल अमीन जहां जा कर कहता हो या रसूले पाक अब मेरी ताक़त के बाद आपकी ताक़त की शुरुआत है उस रसूले पाक की तेज़ रफ़्तारी को कौन पहुंच सकता है मैंने इतनी बातें जो जिब्राईल अमीन के मुताल्लिक बताई वो जिब्राईल क्या कह रहे हैं मेरे नबी से सिदरतुल मुंतहा जाने के बाद अगर यकसर मूये बरतर परम फरोगे तजल्ला बसोज़द परम फारसी में शैख़ सादी फरमाते हैं एक बाल के बराबर भी अगर मैं ऊपर चला जाऊं अल्लाह की तजल्ली के जलाल से मेरे पूरे पर जल जाएंगे यहां से मैं नहीं जा सकूंगा।
अब अंदाज़ा करो मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम को मेरे मौला ने कौन सी ताक़त अता फरमाई नादान मेरे नबी को ज़मीन पर चलता फिरता देख कर के अपने जैसा बशर कहने लग गए अपना बड़ा भाई कहने लग गए तुम्हें अंदाज़ा नहीं जिब्राईल ने कभी नहीं कहा नबी को मेरे जैसा बल्कि जिब्राईल अमीन एक बार मेरे आक़ा के हुज़ूर हाज़िर हुए और क्या कहा जानते हैं जिसको शायर ने अपने फारसी के शेर में यूं कहा है आफाक हा गरदीदा अम बिसियार खूबां दीदा अम फारसी में कहा गया आफाक हा गरदीदा अम बिसियार खूबां दीदा अम लेकिन चुतू चीजे दीगरी या रसूलल्लाह मैंने बहुत कायनात को देखा है बहुत सारे आसमानों का मैंने बहुत सारी दुनियाओं का सफर किया है और बहुत अच्छे अच्छे लोगों को देखा है जिब्राईल कह रहे हैं मगर या रसूलल्लाह आप चीज़ ही अलग हो आपकी कैफ़ियत ही अलग है।
जो जिब्राईल हुज़ूर को अपना बराबर नहीं कह सके ये आज के दूसरे किसी खेत की मूली भी नहीं है वो अगर अपने नबी को कहें कि हमारे जैसे ही थे खाते पीते थे बाज़ारों में घूमते फिरते थे मआज़ल्लाह रब्बिल आलमीन बराबरी करने चलने वाला ये कभी क्यों नहीं सोचते हुज़ूर को ये कहते हैं उनकी भी एक नाक थी दो आंख थे हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के भी दो कान थे सब हमारे भी एक ज़ालिम ऐसे भी कह रहा था तो हम तो उसको यही कहते हैं मियां तू हुज़ूर को सिर्फ देखा तू ये क्यों नहीं कहता कुत्ते की भी एक नाक होती है दो आंख दो आंख होती है दो कान होते हैं तू ये क्यों नहीं कहता कुत्ता भी तेरी तरह है तू कुत्ते की तरह है तशबीह तो यहां पर भी तू दे सकता है सिर्फ आंख और कान और ये सारी चीज़ें हो जाना ये तशबीह की बात है।
उस रसूले पाक सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम के बारे में तुम बात कर रहे हो जिसके मुताल्लिक अहादीसे करीमा ये है जिनके थूक में भी अल्लाह ने शिफा रखी है जिनके पसीने मुबारका को अंबर और मुश्क से ज़्यादा हसीन तरीन खुशबुओं में रखा है उस रसूले पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुताल्लिक कभी भी ज़बान दराज़ी ना करें।
अब रही बात मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम का मेराज अब यहां से सिदरतुल मुंतहा के बाद जो मकामात थे अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के हुज़ूर जो मेरे आक़ा गए हैं अल्लाह हु अकबर वो कैफ़ियत को हम बयान नहीं कर सकते वो कैसी थी वो कौन सी जगह थी और मेरे रब को मेरे आक़ा ने कैसे देखा हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा भी सहाबा ने तो हुज़ूर ने इतना कहा मैंने मेरे रब को बहुत हसीन शक्ल में देखा है लेकिन कोई चेहरा ऐसा था या कोई हाथ था कोई पैर था मआज़ल्लाह अल्लाह के लिए कोई जिस्म साबित नहीं कर सकते ये भी याद रखें आप अल्लाह का कोई जिस्म हम साबित नहीं कर सकते क्योंकि जो तुम्हारे अकल में आ जाए वो खुदा नहीं है अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त को कोई अहाता नहीं कर सकता वो सब को अहाता किया हुआ है।
अब यहां से मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं मुझे आवाज़ आई अपने रब की तरफ से ऐ अहमद करीब आओ ऐ अहमद करीब आओ ऐ अहमद करीब आओ मेरे आक़ा का आसमानों में अहमद नाम है ज़मीनों में मुहम्मद नाम है अहमद बुलाया जा रहा था उसके बाद रब ताला से आप करीब होते गए करीब होते गए हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं रब्बे ज़ुलजलाल ने अपने दस्ते कुदरत को मेरे सीने पर रखा जिसकी ठंडक मैंने महसूस की और मैंने देखा ज़मीन के सारे ख़ज़ाने मेरे सामने खुले हुए थे मैंने आसमानों और ज़मीनों की सारी चीज़ें देख लीं उसी वक़्त मैंने पूरी कायनात को देख लिया अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त जिसके सीने पर दस्ते कुदरत रखे अब उससे कौन सी चीज़ छुपी रहेगी इसीलिए मेरे अज़ीज़ो हमारी ये महफिल भी मेरे आक़ा की नज़रों से छुपी हुई नहीं है अल्लाह ने अपने रसूल को वो ताक़त ओ कुव्वत और तसर्रुफ अता फरमाया है।
अब अंदाज़ा करें हुज़ूरे पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं अब जो राज़ ओ नियाज़ की बातें हुईं अल्लाह और उसके महबूब के दरमियान उसकी सारी तफ़्सीलात तो हैं नहीं अल्लाह तबारक व ताला ने अपने नबी से क्या बातें फरमाईं बहुत सारी बातें थीं लेकिन जो उम्मत के लिए थी वो अहम बातें थीं हुज़ूरे पाक सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम को उस वक़्त मेरे रब ने एक ऑप्शन दिया इख़्तियार दिया वैसे तो खुद अल्लाह ने बुलाया है आज मेरे आक़ा जो मांगते वो मिल जाता और मिला भी।
अंदाज़ा करें हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से रब ताला ये फरमा रहा है ऐ महबूब आज तुम्हारी कोई हाजत है तो बयान कर दो अगर रसूले पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क्योंकि मेरे आक़ा ने कभी ये नहीं कहा कि मौला मुझे अब किसी चीज़ की हाजत नहीं बल्कि हमेशा हम तेरे मोहताज ही हैं ये वो ज़माना था जब मक्का वाले सता रहे थे ये वो ज़माना था जब मक्का वाले सहाबा को घसीटा करते थे हुज़ूर पर सोशल बायकाट के कानून लगाए थे बहुत सारी पाबंदियां की थीं परेशान किए हुए थे मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम अल्लाह ताला से ये अर्ज़ करते कि मौला ये सारी कुल्फतें आज़ाद हो जाएं मक्का में बड़ा महल मिल जाए ऐश से मेरे सारे साथी मेरे सहाबा ज़िंदगी गुज़ारें हुज़ूर सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम से जब रब ताला ने फरमाया ऐ महबूब आज तुम्हारी कोई हाजत है तो बयान करो मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया मौला एक हाजत है मेरी एक हाजत है मेरी तो रब ने फरमाया कहो मेरे महबूब मेरे आक़ा ने अर्ज़ किया मौला मेरी उम्मत की बख्शिश मेरे हवाले कर दे मेरी उम्मत को मेरे हवाले कर दे रब्बी हबली उम्मती जिसका मतलब ही होता है हबली मुझे दे दे मेरी उम्मत।
जो ना भूला हम ग़रीबों को रज़ा याद उसकी अपनी आदत कीजिए जो ना भूला हम ग़रीबों को रज़ा याद उसकी अपनी आदत कीजिए जानते हैं आप आज उसी शबे मेराज के वाक़िए को हम नमाज़ों में अदा करते हैं अत्तहिय्यात हम पढ़ते हैं अत्तहिय्यातु लिल्लाही वस-सलवातु वत-तय्यिबात इसका मजमूआ पूरा फुकहा ने फरमाया जब नबी ऊपर जा रहे थे मेरे रब के हुज़ूर तो ये पढ़ते हुए जा रहे थे अत्तहिय्यातु लिल्लाही वस-सलवातु वत-तय्यिबात जिसका मतलब होता है तमाम पाकियां अल्लाह तेरे लिए तमाम सुथराइयां तेरे लिए सारी तारीफें तेरे लिए जब हुज़ूर ने ये जुमला फरमाया तो रब ताला ने जवाब में यूं फरमाया अस्सलामु अलैका अय्युहन नबिय्यु व रहमतुल्लाही व बरकातुहु देखें सलाम कौन कर रहा है मेरे नबी को अल्लाह खुद फरमा रहा है ऐ नबी तुम पर सलामती हो और अल्लाह की रहमत और उसकी बरकत हो हुज़ूर को सलाम मिला किसकी तरफ से अल्लाह की तरफ से।
और उसके बाद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फिर दोबारा यूं अर्ज़ किया देखें ये भी मौका कैसा है मियां अगर हमें कोई बड़ा आदमी सलाम कर ले तो हम क्या सोचें कि अब हमारी हैसियत बढ़ गई किसी और को याद करें ना करें मगर हुज़ूरे पाक सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम को जब अल्लाह ने सलाम फरमाया तो हुज़ूर आगे बढ़ कर यूं अर्ज़ करते हैं अस्सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस सालिहीन मौला सिर्फ मुझ पर नहीं मेरी उम्मत के सारे गुनाहगारों पर भी तेरा सलाम और सालिहीन बंदों पर भी तेरा सलाम मेरे आक़ा कहां हमें फरामोश किए कहीं हमें भूले हैं मेरे आक़ा रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें किसी जगह पर छोड़ दिया है।
ऐ मेरे अज़ीज़ो अल्लाह के हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जब ये अर्ज़ किया सारे मलाइका सुन रहे थे अल्लाह का कलाम और नबी का ये कलाम हुज़ूर ने पहले क्या कहा अल्लाह की तारीफ में अत्तहिय्यातु लिल्लाही वस-सलवातु वत-तय्यिबात तो रब ताला ने फरमाया अस्सलामु अलैका अय्युहन नबिय्यु व रहमतुल्लाही व बरकातुहु मेरे आक़ा ने फिर कहा अस्सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस सालिहीन तो ये दोनों के कलमे सुनने के बाद फरिश्तों ने कहा अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहु व रसूलुह हम गवाही देते हैं कि अल्लाह के सिवा कोई मआबूद नहीं और हम गवाही देते हैं कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं।
ये अगर कोई अत्तहिय्यात का इतना टुकड़ा भी पढ़ ले तो उसे मेराज समझ में आ जाएगी मेराज का सफर इसके अंदर है हम नमाज़ों में अत्तहिय्यात में बैठे तो ये मंज़र तसव्वुर में ले के आना चाहिए ये मंज़र तसव्वुर में ले के आएं कि रसूले पाक ने ये जुमले अदा किए थे फिर मेरे मौला ने अपने नबी को सलाम किया था और उसके बाद मेरे आक़ा ने हम ग़रीबों को याद किया था फिर फरिश्तों ने सब शहादत बयान की थी हम भी क्यों ना फरिश्तों की शहादत बयान करें।
मेरे अज़ीज़ो रसूले पाक सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम जब वहां से चलने लगे तो रब तबारक व ताला से आपने एक सवाल किया मौला मुझे तूने इनाम में यहां तक बुलाया देखें कहां कहां हुज़ूरे पाक हमारा ख़्याल फरमाते हैं कि सब यहां तक आ नहीं सकेंगे सब तेरे दरबार तक यहां तक नहीं पहुंच सकेंगे मैं जाऊंगा तो मेरी उम्मत मुझसे बार बार तेरे बारे में पूछेगी और वो पूछेंगे कि या रसूले पाक आप तो पहुंच गए हम कैसे जा सकेंगे ऐ अल्लाह मैं अपनी उम्मत को क्या बताऊं तवज्जो रब ताला ने फरमाया ऐ महबूब मैं एक तोहफा तुम्हारी उम्मत को देता हूं अगर वो इस पर अमल करेगी तो हर सजदे में उन्हें मेराज होगी वो है नमाज़ का तोहफा।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने 50 नमाज़ें फर्ज़ कीं उम्मते मुहम्मदिया पर कहा कि रसूल ये ले जाएं 50 नमाज़ें अपनी उम्मत को पढ़ने का हुक्म फरमाएं कि वो दिन और रात में 50 नमाज़ें पढ़ें मैं सोचता हूं हैं तो घंटे 24 अगर 50 नमाज़ें फर्ज़ होतीं तो आधे घंटे से पहले अज़ान होने लग जाती नहीं 24 घंटे में अगर आधे आधे घंटे पर भी हो तो 48 नमाज़ें होतीं फिर दो बच जाती थीं 50 नमाज़ें 24 घंटे में कैसे अदा करते बड़ा मसला था अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने भी ज़ाहिर सी बात है वो बंदों पर उस्र तकलीफ़ तो नहीं चाहता हरज में नहीं डालता मौला इतनी ही ताक़त इतना ही देता है हुक्म जितना बंदे उठा सकते तो जब ये आधे घंटे में नमाज़ हर आधे घंटे में कहां से आएगा बंदा रब भी जानता है लेकिन फिर फर्ज़ किया क्यों उसकी बड़ी हिकमत है।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वो 50 नमाज़ें ले कर के आए किसी आसमान पर हज़रते मूसा अलैहिस सलाम से मुलाक़ात हुई मूसा अलैहिस सलाम भी छठे या पांचवें आसमान पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मुलाक़ात की और पूछा कि क्या आपकी बात हुई हुज़ूर ने बताया कहा मेरी उम्मत को अल्लाह ने 50 नमाज़ें अता कीं मूसा अलैहिस सलाम ने कहा ऐ रसूल वापस जाएं अपने रब से कहें कि कम कर दे आपकी उम्मत इतना नहीं कर पाएगी क्या कहा हज़रते मूसा अलैहिस सलाम ने आपकी उम्मत नहीं कर पाएगी।
अब यहां देखें मेरे आक़ा के इल्मे ग़ैब पर सवाल करने वाले आज 5 वक़्त की नमाज़ें पढ़ रहे हैं कि 50 पढ़ रहे हैं 5 पढ़ रहे हैं ना मूसा अलैहिस सलाम को ये कैसे मालूम था कि उम्मत 50 नहीं पढ़ पाएगी जब मूसा अलैहिस सलाम को ये ग़ैब का इल्म था तो मेरे नबी को कितना ग़ैब का इल्म होगा मूसा अलैहिस सलाम ही ने तो कहा हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम गए रब ताला से अर्ज़ किया मौला इसमें कुछ कम कर दे 5 कम हुईं 45 लेकर आए फिर मूसा अलैहिस सलाम ने रोका कहा और कम कराएं 9 मर्तबा हुज़ूर का जाना आना हुआ है कितनी मर्तबा 9 मर्तबा हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रब ताला के हुज़ूर जाते कम कराते आते।
अब यहां पर भी बाज़ मुफस्सिरीन ने लिखा है कि एक ही बार में डायरेक्ट 45 कम करा के आ जाते अल्लाह को भी मालूम है जब हुज़ूर सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम 5 ले कर के आए थे 5 45 घट गई कितनी बची 5 तो हज़रते मूसा अलैहिस सलाम ने फिर कहा और जाइए कम कराइए तब मेरे आक़ा ने कहा अब मुझे शर्म आ रही है अब हया आती है इससे कम कराऊं लेकिन रब ताला ने ये फरमा दिया ऐ महबूब आपकी उम्मत ये अगर 5 ही पढ़े तो मैं 50 का सवाब दूंगा 50 का पूरा सवाब दूंगा ये 5 में वो 50 नमाज़ों का पूरा सवाब है जो पहले हमें फर्ज़ की गई थी।
अब यहां पर मुफस्सिरीन फरमाते हैं एक साथ कम करवा सकते थे जा कर के सीधे कहते 45 कम कर दे 5 रख जाएंगे मूसा अलैहिस सलाम भी डायरेक्ट ये क्यों नहीं कहे इतनी कम करा के लेके आइए डायरेक्ट तो फरमाया मूसा अलैहिस सलाम वो तजल्ली जो कोहे तूर पर देख नहीं सके थे जो हल्की सी तजल्ली देख कर ग़श खा कर गिर गए थे मूसा अलैहिस सलाम वो रब्बे ज़ुलजलाल की तजल्लियां मेरे मुस्तफा की आंखों में देख रहे थे मेरे नबी की आंखों में देख रहे थे आंखों में आंखें डाल कर के मौला को देख कर आने वाली आंखें कैसी हैं तो इसीलिए जब मेरे आक़ा हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रब ताला के हुज़ूर से वापस आते वो आंखों में ताज़ा जमाल ओ जलाल मेरे रब्बे ज़ुलजलाल का मूसा अलैहिस सलाम तवज्जो से देखते और फिर कहते जाईए हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मामला ये था अपने रब के हुज़ूर जितनी बार जाऊं कम ही है बार बार मुलाक़ात करूं और रब ताला ये चाहता है कि मेरा महबूब आए जाए आए जाए।
हुज़ूर सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम आख़िर में ये तोहफा ले कर तशरीफ़ लाए मेराज के इस सफर में मेरे अज़ीज़ो ये सफर यूं ही कंप्लीट नहीं होता इतनी हिकमतें भरा हुआ सफर है क्या क्या इसमें बयान करें अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम जब तशरीफ़ लाए तो दूसरे दिन अपनी उम्मत को ऐलान फरमाया कि मैंने रब से मुलाक़ात की और रब तबारक व ताला ने मेरी उम्मत को ये तोहफा अता किया फिर नमाज़ें बा जमाअत अदा की जाने लगीं।
ऐ मेरे अज़ीज़ो आज ये जो नमाज़ें हैं ये इस मेराज का सबसे बड़ा पैग़ाम है सबसे बड़ा पैग़ाम है और शबे मेराज मनाने वाले रात भर बैठ कर इबादत करने के लिए आज कई लोग आ जाते हैं नवाफिल पढ़ते रहते हैं शबे मेराज नवाफिल का पैग़ाम देने वाली रात नहीं फर्ज़ नमाज़ों की पाबंदी कराने का नाम शबे मेराज है अल्लाह तबारक व ताला का ये हदिया है तोहफा है उम्मते मुस्तफा के लिए और वो आज उम्मते मुहम्मदिया सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पीठ पीछे फेंक चुकी है नमाज़ों से इस कदर ग़फ़लत है आज ऐसा लगता है कि लोगों पर अभी नमाज़ फर्ज़ हुई ही नहीं।
मेरे अज़ीज़ो अचानक मौत का ऐलान आ जाएगा कयामत के दिन फरमाया गया रोज़े महशर के जां गुदाज़ बुवत अव्वलीं पुर्सिश के नमाज़ बुवत वो कयामत का दिन जो जान पिघला देने वाला होगा सबसे पहला सवाल तुम्हारी नमाज़ों के बारे में होगा जिसकी जितनी नमाज़ें हैं और मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं हिसाब किताब में सबसे पहले तुम्हारे ये नहीं पूछा जाएगा कि कितना खाया कितना पिया कहां कहां पैसा खर्चा किया कैसे कमाया ये नहीं सबसे पहले तुम्हारी नमाज़ों का सवाल होगा और मेरे आक़ा फरमाते हैं जो नमाज़ों में पास हो गया अल्लाह उसके दूसरे मामलात में भी उसे आसान कर देगा और जो यहां फंस गया हर चीज़ में फंस जाएगा।
वो लंबी देर तक महशर के मैदान में फंसा रह जाएगा टेंशन मत लेना वहां पर तो 50 हज़ार साल के बराबर का एक दिन है कहीं नहीं जाना है तुम्हें कहां जाना है मौत भी नहीं आनी है ऐसा है कि सूरज से जल जल के मर जाएंगे नहीं मौत भी नहीं मौत को मौत आ चुकी होगी उस दिन हिसाब पूरा तुम्हारी नमाज़ों का लिया जाएगा।
अब सूरे मुद्दस्सिर की आयतें देखें आप 29वें पारे में अन मुजरिमीन यतसाअलून अन मुजरिमीन मा सलककुम फी सकर जो जहन्नम में जाने वाले मुजरिमीन हैं वो पूछेंगे आपस में एक दूसरे से सवालात करेंगे मियां तुम क्यों आ गए तुम क्यों दोज़ख़ में धकेले गए एक दूसरे से पूछेंगे तो सबमें का सब का जवाब क्या होगा कालू लम नकु मिनल मुसल्लीन वो कहेंगे हम नमाज़ नहीं पढ़ते थे हम नमाज़ नहीं पढ़ते थे इसलिए आ गए उसके बाद और भी वुजूहात हैं लेकिन सबसे बड़ी वजह ये है कि नमाज़ नहीं पढ़ते थे इसलिए दोज़ख़ में डाले गए।
जिनकी नमाज़ें बाकी हैं आज अल्लाह ने सेहत दी है पूरी कर लो जाने से पहले ये कज़ा पूरी कर लो वरना वक़्ते अजल आएगा और तुम्हें फरिश्ता उठा ले जाएगा हो सकता है आज हमारी बातें कुछ लोगों को कड़वी गुज़रें कुछ लोगों को ऐसी लगें कि हमारे ऊपर दिक्कतें हैं तुम्हें ये कयामत के दिन समझ में आएगा मेरे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया बे नमाज़ी का हश्र कारून फिरऔन और हामान के साथ होगा दोज़ख़ के दरवाज़े पर इसका नाम लिखा जाएगा कि फलां बे नमाज़ी था।
मेरे आक़ा सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम ने अपने नज़ा के आलम में वफ़ात का वक़्त करीब है उस वक़्त नमाज़ को मेरे आक़ा ने तर्क नहीं फरमाया इस अंदाज़ से मेरे आक़ा मस्जिद में तशरीफ़ लाए थे सहाबा फरमाते हैं हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो सहाबा के कंधों पर हाथ रख कर के चल रहे थे हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का पैर मुबारक ज़मीन पर घिसटता हुआ आ रहा था मेरे आक़ा ज़मीन पर पैर नहीं रख रहे थे इतनी अलालत इतनी तकलीफ़ के बाद भी मेरे आक़ा मस्जिद में मस्जिदे नबवी शरीफ में जमाअत के साथ नमाज़ के लिए हाज़िर हुए आज लोग सेहतमंदी के साथ नमाज़ें तर्क कर रहे हैं नमाज़ों को भूले बैठे हैं लोग ये समझ रहे हैं कि हमारा हिसाब नहीं होना है।
अज़ीज़ाने गिरामी वक़ार ये आज मेराज के मुताल्लिक जो कुछ भी मैं बयान किया वो आगाज़े बाब था मैंने बरकत के लिए आज ये चीज़ें रखी हैं मेरे मुस्तफा करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का अज़ीम सफर है और ये सफर हम बयान करते रहते हैं सिर्फ इसलिए कि हमारे नए बच्चों में मेरे आक़ा का सफर ये मुंतकिल होता जाए बाद में कोई हमारे इन बच्चों के ज़हनों को ख़रीद कर के ये ना कहे कि ये सब मनघड़त कहानियां थीं कोई हमारे बच्चे को बहका ना सके धोखा ना दे सके इसलिए मेरे अज़ीज़ो अपने बच्चों में ये मुंतकिल करते जाओ सफरे मेराज को मेरे नबी कैसे गए थे मेराज में।
इसीलिए मैं बारहा कहता हूं बच्चों को अगर सिखाना है तो इतना ही सिखा दो पांच हर्फ वाला मेराज है कितने मीम ऐन रा अलिफ जीम पांच ये हर्फ वाला मेराज बच्चों को रटा कर के याद करा दो इनसे इतना ही कहो हमारे उस्ताद ने हमें बताया था बच्चों को ये कहो मेराज की मीम ये बताती है कि मुहम्मद को मेराज हुई सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम किसको मेराज हुई मीम ये बताती है कि मुहम्मद को मेराज हुई ऐन उसके बाद सेकंड हर्फ क्या आ रहा है ऐन ऐन ये बताता है कि अर्श पर गए थे उसके बाद थर्ड नंबर पर आ रहा है रा रा ये बताती है कि रात को गए थे फिर चौथे नंबर पर अलिफ है अलिफ ये बताता है अल्लाह के पास गए थे आख़िर में जीम आ रहा है जीम ये बताता है जिस्म के साथ गए थे।
इतना भी अगर बच्चों को बता दें ये पांच हर्फ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अर्श पर गए थे रात को गए थे अल्लाह के पास गए थे जिस्म के साथ गए थे इतना ही पूरा उसमें शामिल हो गया अपने बच्चों को मुंतकिल करते रहें ये सफरे मेराज इसलिए कि बाद के ज़माने में कहीं ऐसा ना हो कि कुछ बद अक़ीदा इनसे हमारे अकाइद को छीन ना लें हमारी रिवायात को ख़त्म ना कर लें ऐ कदीर ओ जब्बार खुदा हम सबको तू हमारे गुनाहों से आज़ाद कर दे मुआफ फरमा दे हमारे बच्चों को तू सलीका अता फरमा तमीज़ अता फरमा व सल्लल्लाहु ताला अला खैरि खल्किही मुहम्मदिव व आलिही व असहाबिही अजमईन व आख़िरु दावाना अनिल हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन।
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✍️ Written By: Nasir Husain
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