Dushmano Ke Vaar Jadu Aur Bari Nazar - हिफाजत का रूहानी इलाज

Nasir Husain
Nasir Husain

Allama Iqbal Ka Paigham: Mukhalif Hawaon Se Na Ghabrana

हां इसीलिए इक़बाल ये कहता है, तुंदी-ए-बाद-ए-मुखालिफ से ना घबरा ऐ उकाब, ये आती है तुझे ऊंचा उड़ाने के लिए। उर्दू के हार्ड लफ्ज़ होंगे, आपको मैं बताता हूं। कहना ये चाहते हैं इक़बाल, तुंदी-ए-बाद-ए-मुखालिफ से ना घबरा ऐ उकाब। उकाब ईगल को कहते हैं। परिंदा। बहुत ऊंचा उड़ता है ये। ये ऊंचा उड़ता है लेकिन कभी कभार नीचे आ जाता है। और तुंदी-ए-बाद-ए-मुखालिफ का मतलब होता है उल्टा चलने वाली हवा। कभी मुखालिफ सिम्त से हवा तेज़ चलने लग जाए, तो उकाब को मुश्किल हो जाता है कि हवा उधर से आ रही है और ये उड़ इधर से रहा है। तो इक़बाल ये कहते हैं, ऐसी मुखालिफ सिम्त से आने वाली हवा से मत घबरा ऐ उकाब। उकाब क्या करता है उस वक्त? हवा अगर तेज़ी से मुखालिफ सिम्त से आए, तो वो हवा का मुकाबला करने के लिए उसमें घुस नहीं जाता, बल्कि ऊपर जाता है जहां से हवा नहीं आ रही हो। यानी मुखालिफ सिम्त से हवा ना आ रही हो, इतना ऊंचे ऊपर चला जाता है, ताकि ये मुखालिफ सिम्त से आने वाली हवा से मेरा टक्कर ना हो। तो इक़बाल ये कहता है, मुखालिफ सिम्त से आने वाली तेज़ हवाओं से ना घबरा ऐ उकाब, ऐ उम्मत-ए-मुहम्मदिया, ये आती है तुझे ऊंचा उड़ाने के लिए। तुम इनसे ऊपर चले जाओ। तुम्हें तुम्हारी हैसियत बताने के लिए दुश्मन आते हैं। 

Dushmano  Ke Vaar Jadu


Sahaba-e-Karam Ka Yakeen Aur Jang-e-Badr Ke Halat

अज़ीज़ान-ए-गिरामी वकार, आज के हालात भी हमें इस बात की तरफ ला रहे हैं कि हमने देखा है बहुत सारी जगहों पर बद्र के मैदान में सहाबा-ए-कराम रिदवानुल्लाहि ताआला अलैहिम अजमईन ने जो जौहर पेश किए, वो कम अज़ कम दस बारह साल पहले मक्का वाले तसव्वुर भी नहीं कर सकते थे। सोच भी नहीं सकते थे। जिस वक्त रसूले पाक सल्लल्लाहु ताआला अलैहि वसल्लम ने हिजरत फरमाई, मक्का से मदीने जा रहे थे। तेरह साल तक मक्का में कुफ्फार ओ मुशरिक़ीन ने क्या नहीं ज़ुल्म उठाए। सहाबा को पकड़ा है, अंगारे पर सुलाया है। अंगारों पर सुलाया है, सूली पर चढ़ा कर के मुसला किया है, आंख कान नाक काट कर के सहाबा के साथ... बहुत तकलीफें दीं। उस वक्त तो पूरे मुशरिकीन ये समझते थे कि ये कमज़ोर लोग हैं, ज़ईफ लोग हैं जो मुहम्मद के साथ चल रहे हैं, कभी भी इनका खात्मा होगा। और जिस वक्त हुज़ूर हिजरत करके चले गए, तब तो इनकी ताकत और भी बढ़ गई कि हमने तो इनको वतन छोड़ने पे मजबूर कर दिया। इनका गांव छूटा, घर छूटा, रिश्तेदार छूटे, माल व अस्बाब, जायदाद सब छूट गया। कुछ नहीं है इनके पास। इतनी दुश्मनी किया इन्होंने। और उसके बाद जब वो मदीने चले गए, ये हालात थे जो सहाबा को मज़बूत बना दिए। सहाबा को मज़बूत बना दिए। आज हम सब ये जो ढीले ढाले हैं उसकी वजह ही ये है कि हमारा मुकाबला किसी से नहीं है। जिस जगह पर किसी से मुकाबला नहीं होता वो ढीली कौम है। उसे किसी भी चीज़ से अपने मुकाबले की ताकत का अंदाज़ा ही नहीं होता। 


मेरे अज़ीज़ों सुना है, शेर को भी अगर कुत्तों के साथ पाला जाए तो फिर वो शिकार करना छोड़ देता है। उसे उसकी हैसियत मालूम नहीं रह जाती, याद नहीं रह जाता बरसों अगर रहा तो। सहाबा-ए-कराम वहां मक्का से मदीने चले गए। मुशरिकीन अभी भी ये सोचते थे कि जिस तरह हम इनको मक्का में कभी भी पकड़ के मारते थे, एक सहाबी हैं जिनको 16 साल तक कैद में रखा था इन्होंने। ज़ंजीरों से बांध करके। वो ज़ुल्म ढाए थे। तो ये सोचते थे कि इस तरह से हम कभी भी इनके ऊपर कुछ कर देंगे। लेकिन एक मर्तबा आए मदीने पर चढ़ाई करने के लिए हज़ार से ज़्यादा लोग। और बद्र के मैदान में जो सहाबा ने जौहर दिखाए, इनके पूरे के पूरे परखच्चे उड़ा दिए। जितने गुरु घंटाल थे सब के सब मैदान-ए-बद्र में कत्ल हो गए। अबू जहल, उत्बा, शैबा जितने बड़े बड़े थे शैतान, सब कत्ल हो गए। बद्र की उस वादी में वो मुशरिकीन कहते हैं कि हमें तो ये अंदाज़ा ही नहीं था कि इतने ताकतवर हो चुके ये लोग। इतना मुकाबला करने की इनके अंदर हिम्मत आ गई। बल्कि वो ये भी कहते हैं कि बसा औकात हम देख रहे थे उनके पास तो लकड़ी की ढालें थीं, तलवारें भी नहीं थीं। लकड़ियों से लड़ रहे थे। सहाबा रसूलुल्लाह के। और मुशरिकीन-ए-मक्का कहते हैं, कभी कभार ये गर्दन के करीब तलवार लाते थे अभी हमला भी नहीं होता था, किसी की गर्दन कट गई होती थी। वैसे ही खत्म हो गए होते थे। 

Dushmano  Ke Vaar Jadu 1


ये सहाबा-ए-कराम रिदवानुल्लाहि ताआला अलैहिम अजमईन की मदद भी थी और उनका यकीन था, उनका जो मुस्तहकम अमल था उसकी वजह क्या है? मुशरिकीन ने ये दुश्मनी ऐसी की कि सहाबा को इतनी बुलंदी पर पहुंचाया यकीन के साथ, कि वो सहाबा मैदान में उतरे तो अल्लाह के भरोसे उतरे थे। मेरे अज़ीज़ों ये हालात सब की ज़िंदगियों में होंगे। दुश्मन जो होता है वो तुम्हें मज़बूत करने के लिए होता है। एक बुज़ुर्ग ने फरमाया था... बुज़ुर्ग बैठे हुए थे और अचानक वो दुआ करने लगे कि अल्लाह ये दुश्मनों को सलामत रखे। ये भी नेमत हैं। तो सब लोगों ने कहा कि हुज़ूर दुश्मनों के हिलाकत की दुआ की जाती है, आप कह रहे हैं वो सलामत रहें? कहते हैं हां इसलिए कि वो होते हैं तो हमारा ईमान मज़बूत होता है। वो हमारे ईमान को मज़बूत करते हैं। और हत्ता कि उस बुज़ुर्ग ने फरमाया अगर ये ना हों तो हमें शहादत का दर्जा कहां से मिले? ग़ाज़ी का दर्जा कहां से मिले? इनके साथ मुकाबला हो तो ही ये सब मामलात हैं। कोई हो ही ना, तो फिर कहां से हमें ये सब नेमतें मिलेंगी? बहरहाल उनका अपना कांसेप्ट उनका अपना तसव्वुर। लेकिन हमारे लिए ज़िंदगियों में मेरे अज़ीज़ों, हर एक के साथ अल्लाह ताआला ने एक शैतान पैदा किया है। हर एक के साथ एक शैतान है। 


नबियों के साथ जब कहा गया, तो शैतान तुम्हारे साथ भी है, हमारे साथ भी है। अब शैतान की दो किस्में बयान की गई हैं कुरआन में। एक इंसानों में से और एक जिन्नात में से। और आपने सूरह नास में पढ़ा होगा। आखिरी आयतें जो हैं। अल्लज़ी युस्वसविसु फी सुदूरिन नास। मिनल जिन्नति वन्नास। उस शैतान से अल्लाह की पनाह जो लोगों के सीनों में, दिलों में वसवसे पैदा करता है। वो कौन है? मिनल जिन्नति वन्नास। जिन्नात में से और इंसानों में से। और इसी तरह अभी मैंने जो आयत पढ़ी। अल्लाह फरमाता है 'व कज़ालिका जअल्ना लिकुल्लि नबिय्यिन अदुव्वन शयातीनल् इंसि वल जिन्न'। हमने हर नबी के साथ एक दुश्मन पैदा किया इंसानों में से और जिन्नात में से एक शैतान। तो शैतान दोनों में भी है। इंसानों में से भी होगा, जिन्नात में से भी होगा। बहुत सारे लोग ये तसव्वुर करके बैठे रहते हैं शैतान का मतलब दो बड़े सींग वाला होगा, बकरे की मुंडी वाला होगा, लंबे बालों वाला होगा। शैतान की ऐसी कोई शक्ल नहीं। शैतान तुम्हारे करीबी दोस्त की शक्ल में भी आ सकता है। जो तुम्हारे आस पास हैं इनमें से कोई शैतान हो। अच्छी शक्लों में भी होगा। और जिन्नात में से जो शैतान है वो गायब होगा। लेकिन ये दोनों हमारी ज़िंदगी पर बहुत असर करते हैं। बहुत बुरी तरह से असर करते हैं। ये मुसलसल खैर के रास्ते से हमें भटकाने की कोशिश करते हैं। ये नमाज़ें हैं तुम्हारी, ये दुआएं हैं और बुज़ुर्गों की सोहबतें हैं जो इन शैतानों से तुम्हें बचा रखी हैं। वरना इनसे मुकाबला करते करते आदमी कितने तो गुमराह हो गए। भटक गए। 

Dushmano  Ke Vaar Jadu 2


कौन है जो तुम्हें अचानक बैठे बैठे बुरी ख्वाहिशात ला करके उस मैदान में ले चला जाता है। वो शैतान है। जो तुम्हारे साथ लगा हुआ है। तुम अच्छे भले थे मस्जिद में बैठे हुए थे। उठ करके गए फिर खुराफात दिमाग में आई। चलना है फलां जगह पर गुनाहों के अड्डे पर। कौन लेकर के गया तुम्हें? दो! या तो एक गायब लेकर के जा रहा होगा या तो एक कोई हाज़िर होगा। हाज़िर होगा तो तुम्हारा दोस्त होगा, गायब होगा तो वो जिन्न होगा। ये दोनों में से कोई एक तुम्हें लेकर के जा रहा है। और तुम भटक गए, बहक गए। मेरे अज़ीज़ों इनसे मुकाबला करने के ही लिए इस दुनिया में हमें भेजा गया। और अल्लाह ताआला कुरआन-ए-पाक में यूं फरमाता है... पहले पारे की आयत है अल्लाह तबारक व ताआला यूं इरशाद फरमाता है। आदम अलैहिस्सलाम और हज़रत हव्वा को जब जन्नत से उतारा गया था। अल्लाह ताआला फरमाता है वलकुम फिल अर्ज़ि मुस्तकर्रुव व मताउन इला हीन। तुम्हारे लिए एक मुकर्ररा मुद्दत तक यहां पर हम भेज रहे हैं दुनिया में। और हर एक को एक का दुश्मन बना करके भेज रहे हैं। यानी शैतान को इंसान का दुश्मन बना करके भेजा गया है। इससे मुकाबला करते रहो और वापस तुम्हें हमारे पास आना है और हम तुम्हारे आमाल का सवाल करेंगे। यहां हमें जो भेजा गया है, मुसलसल हर दिन हम लड़ाई में मौजूद हैं। हर दिन हम लड़ाई में हैं। अपने ज़हन में मौजूद ख्यालात से लड़ रहे हैं। अपने आस पास के हालात से लड़ रहे हैं। और अगर ये दुश्मन ना होता तो आप अल्लाह की ज़ात पर यकीन कैसे करते? उसकी बारगाह में झुकने की और दौड़ करके आने की आपके अंदर जो तमन्ना है वो कहां रह जाती? इसीलिए मैंने शुरू में ही कहा अगर दुश्मन ना हो तो आदमी ढीला पड़ जाता है और उसे किसी चीज़ की हाजत ही नहीं रहती, ज़रूरत ही नहीं होती।


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मैंने एक दानिश्वर से पढ़ा था, जापान वाले लोग... ये तवज्जो से सुनिए। मछली खाने के बड़े शौकीन। और वैसे भी उस तरह के ये जो लोग हैं चाइनीज़ टाइप के इनके यहां मछली का रिवाज़ ज़्यादा है। लेकिन जापानी लोगों का एक... उनकी एक आदत ये थी कि वो ताज़ी मछली खाते थे। तो होता ये कि समंदर से मछलियां पकड़ करके लाने तक वो बासी हो जातीं, मर गई होती थीं। क्योंकि दो दो दिन तीन तीन दिन के बाद मछुआरे आते थे बड़ी मछलियां लेकर। तो अब उसके लिए इन लोगों ने एक दूसरा तरीका इख्तियार किया। कि नहीं ताज़ा मछली खानी है। तो एक बहुत बड़े टैंकर जहाज़ के समंदरों में भेजे गए उसमें पानी रहता था। मछलियां समंदर से पकड़ी जाती थीं और पानी में डाल दी जाती थीं। और पानी में डालने के बाद वो पानी में तैरती रहती थीं तो ज़िंदा रहतीं और जब साहिल पर आते तो अभी मछलियां ज़िंदा ही रहती थीं मरी हुई बासी नहीं होती थीं। तो ये चंद दिन तक चला लेकिन ये भी फेल हो गया। क्यों? वजह ये थी कि लिखने वाले ने लिखा है, कि वो मछलियां जो समंदर में तैरती थीं उस तरह से ये टंकी में नहीं तैर रही थीं। यानी छोटी जगह थी पानी अलग था, तो वो भी सुस्त हो जाती थीं, काहिल हो जाती थीं। ज़िंदा तो रहती थीं लेकिन काहिल रहती थीं। सुस्त। और यहां आने तक सुस्त मछलियां होती थीं। तो जापानी लोगों ने ये कहा कि सुस्त मछलियां खाने से हमारी तबीयत में भी सुस्ती ज़्यादा ना आ जाए। हमें एक्टिव चाहिए हरकत वाली। 


जानते हैं उसके बाद उन्होंने एक तीसरा तरीका इख्तियार किया। कहा कि बहुत बड़े टैंकर को तो ले जाया जाता है मछलियां पकड़ने के लिए। अब ये हरकत में नहीं रहती एक दिन दो दिन के बाद ये ढीली पड़ जाती हैं। तो ऐसा किया गया एक शार्क मछली को भी पकड़ा गया छोटी, और उसको इसमें डाला गया। और छोटी मछलियां जो हैं उसी से तो भागती हैं समंदर में, कि ये अपना लुक्मा बना लेती है। तो ये शार्क मछली उनको दौड़ाती रहती। जितने खा ली खा ली, और जितने बच गए वो साहिल पर आने तक बिल्कुल एक्टिव हरकत वाली मछलियां होती थीं। उनको लेकर के जापानी लोग खाया करते थे। तो उस दानिश्वर ने कहा ये वाकिया लिख करके कि ये शार्क मछली इसलिए छोड़ी गई थी कि इनको एक्टिव रखा जाए, हरकत में रखा जाए। और ये दौड़ती रहतीं दौड़ती रहतीं और ज़िंदा भी रहतीं दौड़ती भी रहतीं। वो दानिश्वर कहता है इसीलिए हर एक की ज़िंदगी में एक शार्क का होना ज़रूरी है। ताकि वो उसे दौड़ाता रहे दौड़ाता रहे और वो भाग करके अल्लाह की बारगाह में आता रहे। हम सब की ज़िंदगियों में एक दुश्मन होता है। एक दुश्मन होता है। और उस दुश्मन के होते ही हम लोगों के अंदर अल्लाह ताआला की तरफ दौड़ने का ख्याल आता है। रब ताआला की पनाह मांगने का बार बार ये एहसास होता है। आप खुद अपनी ज़िंदगियों में महसूस करते होंगे। 


हम जिसके पास भी जाते हैं किसी से मुलाकात किया किसी के घर में गया सबसे पहले वो दुआ की दरखास्त करते हैं। क्यों मियां आप खुद भी तो दुआ करते हैं? हमें दुआ की दरखास्त क्यों करते हैं? और फिर अगर तफसील से कहेंगे तो यही कहेंगे कि हज़रत फलां फलां मामलात में बहुत घिर गया हूं। लोगों की नज़र बहुत है आप दुआ करें। अल्लाह बुरी नज़र से बचाए। ये कॉमन दुआ है सब के लिए है। यानी सब को एहसास है कि कुछ लोगों की बुरी नज़र है। बुरी नज़र का ये तुम्हारे अंदर जो एहसास आया, यही एहसास तुम्हें अल्लाह की बारगाह में पनाह मांगने पर ले आता है। अल्लाह के करीब हो जाते हो। और इसी वजह से अल्लाह ताआला ने भी तुम्हें मायूस नहीं किया। कुरआन में अल्लाह फरमाता है 'फला तखशौहुम वखशौनी'। उनसे मत डरो मुझसे डरते रहो। लेकिन है कि अल्लाह के पास तो आओ। दुश्मन तो हैं तुम्हारे लेकिन डरो मत। अल्लाह फरमाता है मेरे दरबार में आओ। और अल्लाह ने दो सूरतें उतारीं 'कुल अऊज़ु बिरब्बिल फलक' और 'कुल अऊज़ु बिरब्बिन्नास'। 


Buri Nazar, Jadu Aur Shaitani Takaton Se Bachne Ka Ruhani Ilaj

मेरे आका सल्लल्लाहु ताआला अलैहि वसल्लम पर जादू किया गया था पता है आपको? हुज़ूर-ए-अकरम सल्लल्लाहु ताआला अलैहि वसल्लम पर जादू किया गया था ऐसा सख्त जादू कि हुज़ूर का जिस्म बुखार से पूरा ज़र्द हो गया था। और फिर वो पता भी किया गया कि कहां जादू करके क्या किया गया है आपका पुतला बनाकर उसमें सुइयां या फिर बाल वगैरह लगाकर के जिस तरह से भी जादू किया गया। हुज़ूर सय्यदुल मुरसलीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ये असर किया गया। उसके इलावा खैबर के मौके पर ज़हर दिया गया था। गोश्त में ज़हर रख करके। हुज़ूर-ए-पाक सल्लल्लाहु ताआला अलैहि वसल्लम पर जब ये इस तरह के हमले हुए थे, तो अल्लाह ताआला ने मुअव्वज़तैन को उतारा। मुअव्वज़तैन किसको कहते हैं? कुल अऊज़ु बिरब्बिल फलक और कुल अऊज़ु बिरब्बिन्नास। कहा गया जो इसको पढ़ ले अल्लाह दिन भर उसको जादू सहर से महफूज़ रखेगा। तुम्हारे पास ये हथियार हैं। तुम्हारे पास ये आलाजात हैं। 


बहुत सारी जगहों पर मैंने देखा इससे कब्ल भी मैंने ये कहा है आजकल ये आम हो गया है कुछ शयातीन हैं रू-ए-ज़मीन पर जो इन्हीं कामों में मसरूफ हैं। एक दूसरे पर हमला करने जादू सहर सिफली टोटके ये सारी चीज़ों पर दूसरों की ज़िंदगियों को खराब करने में। और आज का सबसे बड़ा हमला जो हो रहा है वो हमारी बच्चियों पर है लड़कियों पर है। कितने तो ऐसे दुकान खोले हुए बैठे हैं जो मोहब्बत का तावीज़ करते हैं। किसी लड़की को अपने काबू में करने के आमाल करके दिए जाते हैं ये शैतानी आमाल के ज़रीए से। और लड़कियों पर गलत तरीके से असर करके कितने ऐसे हैं मैंने खुद देखा है। अच्छे अच्छे घरों की बच्चियों पर ये अमल करके उन्हें अपने कंट्रोल में कर दिया जाता है और उसके बाद उनको ले जाया जाता है। और कुछ तो वो हैं जो शादी कर लिए और कुछ तो वो हैं जो उन्हें कोठे में बेच दिए। बच्चियां महफूज़ नहीं रह जातीं इसीलिए मैं अपनी लड़कियों को अपनी बेटियों को सब को अपने घरों में भी ये तल्कीन करता हूं ताकीद करता हूं कि रोज़ाना सुबह उठते ही सात बार 'कुल अऊज़ु बिरब्बिल फलक' और सात बार 'कुल अऊज़ु बिरब्बिन्नास' पढ़कर अपने ऊपर दम कर लिया करें। अल्लाह तबारक व ताआला मुअव्वज़तैन की बरकतों से ये शयातीन के हमलों से महफूज़ रखेगा। और हुज़ूर-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सही हदीस है बुखारी शरीफ की कि हुज़ूर ने अपने मदीने की जो खजूर है अजवा खजूर मशहूर है। सारे हाजी जब जाते हैं तो अजवा खजूर लेकर आते हैं। बुखारी शरीफ की हदीस है मेरे आका सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जिसने सुबह सात दाने अजवा खजूर के खा लिए उसे पूरे दिन ज़हर भी असर नहीं करेगा जादू भी असर नहीं करेगा। सहर भी असर नहीं करेगा। तो ये सारे हमारे पास इलाज भी मौजूद हैं। तो आप सिर्फ दुश्मनों से घबरा कर डर कर के हिम्मत ना हारें। 


Imam Razi Ka Waqia: Murshid-e-Kamil Aur Nisbat Ki Ahmiyat

अब आखिरी बात ये भी है कि औलिया-ए-कामिलिन की ज़िंदगियां इसमें हमारे लिए बहुत बड़ा आइडियल हैं। बहुत बड़ा आइडियल हैं। हज़रत फखरुद्दीन राज़ी बहुत पाए के बुज़ुर्ग थे इमामुल मंतिक कहलाते थे इमामुल फलसफा। उलूम के माहिर थे लेकिन जब आपका आखिरी वक्त आया तो शैतान उनके सिरहाने पर आया। और कहने लगा कि राज़ी तुम अल्लाह को एक मानते हो उसकी कोई दलील है? उन्होंने दलील दे दी। कायनात का निज़ाम इस तरह से है इसको चलाने वाला एक ही होना चाहिए। शैतान ने उस दलील को काट दिया। कहा कि दो भी तो हो सकते हैं मेरी दलील ये है। आपने फिर दूसरी दलील दी अल्लाह के एक होने पर। शैतान ने वो दलील भी काट दी। एक दो तीन दलीलें देते देते इमाम राज़ी 360 दलीलें दे चुके थे। आखिरी वक्त था इनका। इमाम राज़ी अपने अल्लाह के एक होने पर 360 दलीलें दीं। हम क्या दलील देंगे? आप क्या दलील देंगे अल्लाह के एक होने पर? मरने के वक्त तो छोड़ो अभी बोलो। अभी अगर कोई पकड़ के पूछ ले। कुछ नहीं होगा। इमाम राज़ी जैसा आलिम-ए-दीन जब वो 360 दलीलें दे चुके तो डगमग होने लग गए अल्लाह एक है भी कि नहीं? शैतान इस तरह के हमले कर रहा था। 


ये तो उनकी निस्बत का असर है कि हज़रत सैय्यदना नज़मुद्दीन कुबरा जो फखरुद्दीन राज़ी के पीरो मुर्शिद थे। पीरो मुर्शिद से निस्बत का ये असर होता है दूर से ही मुर्शिद ने अपने मुरीद की हालत को देखा और पुकार कर कहा ऐ राज़ी वो इब्लीस है तू उससे बहस कर रहा है अपने खुदा के एक होने पर दलील दे रहा है उससे कह मैं अपने खुदा को बगैर किसी दलील के एक मानता हूं। तो राज़ी को अपने पीरो मुर्शिद की आवाज़ आई तो उन्होंने कहा ऐ इब्लीस-ए-लईन मैं अपने रब को बगैर किसी दलील के एक मानता हूं। शैतान वहां से जाने लगा और कहा राज़ी इस मौके पर मैंने सत्तर से ज़्यादा बड़े उलमा का ईमान ले लिया था, आज भी तेरा ईमान खत्म हो जाता अगर तेरा पीर ज़िंदा ना होता। अगर तेरा मुर्शिद इस तरह की बात ना किया होता। 


अज़ीज़ान-ए-गिरामी वकार औलिया-ए-कामिलिन उनके साथ भी ये मामलात हुए हमले हुए शयातीन के लेकिन कुछ चीज़ें ऐसी हैं जो बचा ले जाती हैं हमेशा इल्म ही नहीं बाज़ औकात बुज़ुर्गों की सोहबत और उनकी निस्बत हमारी हिफाज़त करती है। इसीलिए आला हज़रत फाज़िल-ए-बरेलवी रदी अल्लाहु ताआला अन्हु ने अपने इल्म पर... आला हज़रत का जैसा इल्म आज के ज़माने में कौन मिसाल ला सकता है जो 55 उलूम ओ फुनून का माहिर हो। फतावा रिज़विया जैसी तीस जिल्दों की मुकम्मल किताब हमारे पास। कुरआन का तर्जुमा कंज़ुल ईमान की सूरत में। इश्क-ए-रसूल से भरी हुई हदाइक़े बख्शिश। ज़िंदगी पूरी कलम चलाते चलाते जिसकी गुज़री और एक नहीं बेहतरीन शागिर्द पैदा करके पूरी उम्मत पर एहसान किया। इल्मी बड़ा काम किया। लेकिन फख्र इस पर नहीं किया कि मैंने इतनी किताबें लिख दीं मैंने फतावा रिज़विया लिखा है मैंने हदाइक़े बख्शिश लिखी है मैंने कंज़ुल ईमान लिखा है... नहीं ये सारी चीज़ें नहीं। बारगाह-ए-मुस्तफा सल्लल्लाहु ताआला अलैहि वसल्लम में जब पेश होना हुआ था हुज़ूर की बारगाह में तो आला हज़रत यूं कहते हैं 'या रसूलल्लाह तेरी सरकार में लाता है रज़ा उसको शफी जो मेरा ग़ौस है और लाडला बेटा तेरा'। और अपनी निस्बत पे फख्र कैसे करते हैं? 'क्या दबे जिस पे हिमायत का हो पंजा तेरा, शेर को खतरे में लाता नहीं कुत्ता तेरा'। 


ग़ौस-ए-पाक की तरफ निस्बत करते हुए वो कहते हैं आपका ये कुत्ता है इसको कोई दुनिया का शेर भी दबा नहीं सकता। ग़ौस-ए-पाक के दरबार की निस्बत पर फख्र किया ये नहीं कहा कि मैं बहुत बड़ा आलिमे दीन हूं बहुत बड़ा फकीह हूं मुझे कौन क्या हरा सकता है बल्कि यूं कहा ग़ौस-ए-पाक के दरबार का कुत्ता है उसे दुनिया का कोई शेर भी दबा नहीं सकता। हमारे लिए भी मेरे अज़ीज़ों चंद चीज़ें ज़रूरी हैं आपको निस्बतों की भी ज़रूरत है और अपने अमल की भी ज़रूरत है। आपके अपने वज़ीफे अपनी दुआएं अपने आमाल और इबादतें और साथ ही किसी मुर्शिद-ए-कामिल की और बुज़ुर्गों के सिलसिले तो ज़हब की निस्बत की ज़रूरत है ये दो चीज़ें होंगी इंशाअल्लाह हर तरह के दुश्मनों के वार से आप दुनिया में महफूज़ रहेंगे इंशाअल्लाह। इंशाअल्लाह हर तरह के वार से महफूज़ रहेंगे। 


अल्लाह तबारक व ताआला हम सब को शयातीन-ए-इंस और शयातीन-ए-जिन्न के हर हमला से हिफाज़त फरमाए। उनके तमाम वार से हमारी हिफाज़त फरमाए रब्बे कदीर इस दुनिया से जाने तक हमारा ईमान सलामत रखे और बारगाह-ए-रब्बुल इज़्ज़त में हमें ईमान के साथ उठाए। व आखिरू दावाना अनिल हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन। अस्सलामु अलैकुम।


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✍️ Written By: Nasir Husain

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