Karbala Ka Waqia - इमाम हुसैन की शहादत

Nasir Husain
Nasir Husain

Ali Asgar Ki Shahadat Aur Ghar Ka Dardnak Manzar

अली असगर की शहादत के बाद, घर में एक अजीब सी कैफियत थी। अल्लाहु अकबर, यह आखिरी वक्त है मेरे अज़ीज़ो। हुसैन इब्ने अली रज़ियल्लाहु ताला अन्हु के घर में सिवाय उनके बेटे ज़ैनुल आबिदीन के, जो बीमार थे, उनकी उम्र 22 साल की थी, कमज़ोर थे, बुखार जदा थे। लेटे हुए खैमे में बुखार से उनका जिस्म तप रहा था। वो सारा मंजर वो अपनी बीमारी में देख रहे थे। अब कोई बाकी नहीं था, बच्चे को तक नहीं छोड़ा, तो कौन बाकी रहेगा। 

Karbala Ka Waqia - इमाम हुसैन की शहादत


Imam Zainul Abideen Ki Bimari Aur Bebasi

इमाम हुसैन इब्ने अली रज़ियल्लाहु ताला अन्हु ने देखा, कुरान को जल्दी से खोला, तिलावत करने लगे। अचानक खैमे के दरवाज़े पर देखा आहट महसूस हुई तो उठा करके चेहरा देखा तो इमाम ज़ैनुल आबिदीन जुब्बा पहन कर खड़े हैं। कहा बाबा इजाज़त दे दें। मौला हुसैन तड़प कर उठे, कहा ज़ैनुल आबिदीन, मेरे घर में अब बचा कौन? मेरे बाद इन बीवियों की कौन देखभाल करेगा? इन औरतों को कौन ले जाएगा? और मेरी नस्ल तुमसे ही तो चलनी है। 


Imam Hussain Ka Aakhiri Jubba Aur Bibi Fizza

इमाम सज्जाद ज़ैनुल आबिदीन को मौला हुसैन ने रोक दिया, बिस्तर पर लिटा दिया और कहा कि अब मेरा वक्त है, मेरा मकाम है। इसी असना में औरतों को कुछ नहीं कहा, फ़िज़ा कनीज़ थी फ़ातिमा ज़हरा की, बुलाया, ऐ फ़िज़ा जाओ अंदर बीवियों के पास एक संदूक है, उस संदूक में एक जुब्बा रखा है, वो जुब्बा उठा लाओ। लेकिन खबरदार ज़ैनब को मत बताना। ज़ैनब से मत कहना। वो फ़िज़ा गई, जल्दी से वो संदूकचा खोलने लगी और जुब्बा उठाया तो बीबी ज़ैनब देख लीं। 

Imam Hussain Ka Aakhiri Jubba Aur Bibi Fizza


Bibi Zainab Aur Imam Hussain Ki Aakhiri Mulaqat

कहा क्या कर रही हो? कहा ये जुब्बा ले जाने के लिए मौला ने हुक्म दिया है। वो दौड़ती हुई आई, लाओ मैं ये जुब्बा लेकर के जाती हूँ। वो खुद अपने हाथों से ले आई मौला हुसैन के खैमे में, और वो जुब्बा लाकर के देती हैं, और पहनाती हैं। इमाम हुसैन ने कहा, ज़ैनब, तुझे मालूम है अम्मा कहती थीं, फ़ातिमा तुज़ ज़हरा ने कहा था, हुसैन ये जुब्बा संभाल कर रखना, ये तेरे बाबा हैदर-ए-कर्रार का है, जो रसूलुल्लाह ने उन्हें दिया था। 


Maula Hussain Ko Fatima Zahra Ki Wasiyat

और मुझे वसीयत की थी, फ़ातिमा तेरा बेटा जब भी मुसीबत में आए तो ये जुब्बा उसे पहना देना। ज़ैनब कहती हैं सच कह रहे हो भैया, मुझे भी मां ने कहा था कि ज़ैनब, हुसैन कभी अगर मुसीबत में आ जाए, अगर वो जुब्बा भूल जाए तो अपने हाथ से पहनाना। दोनों ने एक दूसरे को समझाया, मां की वसीयत पर अमल किया।


Imam Hussain Ka Dulhe Ki Shakl Ikhtiyar Karna

वो कैसा मंजर था जब हुसैन दूल्हा की शक्ल इख्तियार कर गए थे। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का अमामा पहना हुआ है, और जुब्ब-ए-मुबारका हैदर-ए-कर्रार का जो रसूल का अता किया हुआ है। जाफर-ए-तय्यार का पट्टा बांधा और अमीर हमज़ा रज़ियल्लाहु ताला अन्हु के तबर्रुकात आपके साथ थे। तलवार हैदर-ए-कर्रार की ज़ुल्फ़िकार आपके हाथ में थी। ये सारा मंजर पूरे खैमे को रुला गया। 

Imam Hussain Ka Dulhe Ki Shakl Ikhtiyar Karna


Karbala Ki Taraf Imam Hussain Ki Rawanagi

जैसे कोई जवान शहज़ादा दूल्हा बारात में जाता है, खैम-ए-हुसैन से ये पूरी तैयारियों के साथ हुसैन इब्ने अली निकल रहे थे। मुझे वो मंजर याद करके बड़ा दुख होता है, आज हम अपने हुजरे से कभी निकलते हैं तो फिर याद आती है। हुसैन तो खैमागाह से निकले थे कत्लगाह की तरफ, आज तो हम अमन के लिए बाहर निकलते हैं तो सज संवर कर निकलते हैं, वो बारगाह-ए-मौला में निकल रहे थे।


Bibiyon Ki Aah Aur Imam Hussain Ki Vidai

इसी असना में हुसैन इब्ने अली करमल्लाहु वजहुल करीम बाहर जाने की तैयारी में हैं, बीवियों की एक आह निकली। बीबी ज़ैनब ने कहा, और बीबी सकीना ने कहा, सारे घर की औरतों ने कहा, बाबा, भैया आप किसके हवाले हमें छोड़ जा रहे हैं? हुसैन इब्ने अली ने पीछे औरतों की तरफ देखा, कहा मैं तुम्हें अल्लाह और उसके रसूल के हवाले कर जा रहा हूँ। सब खामोश हो जाओ, मेरे बाद कोई नौहा नहीं करना, मेरे बाद कोई मातम नहीं करना। 


Khandan-e-Nubuwwat Ki Bachchiyon Ke Hijab Ki Wasiyat

उसके बाद सब्र की तलकीन की और फिर आखिरी वसीयत ये थी, खानदान-ए-नुबुव्वत की बच्चियां कभी बेआबरू नहीं होतीं, बेहजाब नहीं होतीं। किसी का पर्दा हटने न पाए, किसी का हिजाब सरकने न पाए। सारी बीवियों ने सलाम किया, मौला हुसैन निकल कर अपने घोड़े ज़ुलजनाह पर आए। 


Zuljanah Ghode Ki Wafadari Aur Imam Hussain Ki Sawari

यह बड़ा अज़ीज़ घोड़ा था। हुसैन इब्ने अली का बड़ा वफादार घोड़ा है। ज़ुलजनाह को भी हम सलाम पेश करते हैं कि हुसैन की सवारी पूरी ज़िंदगी भर वो लेकर घूमता रहा। ज़ुलजनाह हुसैन इब्ने अली की प्यास की वजह से जब उसे पानी मिलता तो कभी पिया नहीं करता था। ये रिवायत बताती हैं, हुसैन इब्ने अली के बाद उस घोड़े ने कभी पानी पिया, ज़िंदा तो रहा लेकिन कभी पानी को मुंह तक नहीं लगाता था। 


Bibi Sakina Aur Zuljanah Ghode Ka Dardnak Manzar

वो ज़ुलजनाह सवार जिसको तैयार करके खैमे के बाहर खड़ा किया गया है, मौला हुसैन जैसे ही घोड़े पर बैठे, बीवियों की एक अलविदाई आवाज़ आई कि हुसैन जाओ खुदा तुम्हारा भला करे, अल्लाह तुम्हारा मुहाफ़िज़ है। घोड़े को एड़ लगाई, मगर घोड़ा आगे नहीं बढ़ता था। घोड़ा आगे नहीं जाता था। ज़ुलजनाह को मौला हुसैन ने कहा, ऐ ज़ुलजनाह तूने कभी मेरी नाफरमानी नहीं की, आज तक तूने मेरी कभी हुक्म उदूली नहीं की। तो घोड़े को फिर एड़ लगाई और उसके कान पकड़ कर खींचा। 


Imam Hussain Ka Zuljanah Ko Hukm 

वक्त बहुत कम है हुसैन के पास, चल आगे बढ़, चल आगे बढ़ आज तो अपने जौहर दिखा। मौला हुसैन पुकारते रहे, घोड़ा आगे नहीं बढ़ता रहा। और घोड़ा झुक कर के इशारे से पैरों की तरफ दिखा रहा था। हुसैन इब्ने अली उतर कर के देखते हैं, बीबी सकीना सामने दोनों घोड़े के पैर पकड़ कर बैठी है। और ज़ुलजनाह से कहती है, ऐ ज़ुलजनाह क्या तू बाबा को आखिरी बार ले जा रहा है? क्या तू आखिरी बार ले जा रहा है? हमारे घर की तमाम रोशनियां तू ले जा रहा है, हमारे घर का सूरज गुरूब करने ले जा रहा है। 


Bibi Sakina Ko Imam Hussain Ki Aakhiri Nasihat Aur Sabr 

बच्ची छोटी सी घोड़े के सामने के पैरों को पकड़ कर बैठी है। मौला हुसैन घोड़े से उतर आए, बीबी सकीना को उठा लिया। गोद में उठा लिया, माथे के बोसे लिए और कहा, सकीना तुमने अली असगर की मौत पर सब्र किया, अली अकबर पर सब्र किया, सारी लाशें तूने देखीं। अब तू अपने बाबा के साथ भी सब्र का मुज़ाहिरा कर। तू अपने बाबा के साथ भी सब्र का मुज़ाहिरा कर। बीबी सकीना को इसी तरह लौटा दिया गया, वो खैमे में जाकर हसरत भरी निगाहों से देखती रह गई, चौखट पर खड़ी रह गई।


Imam Hussain Ka Maidan-e-Karbala Mein Aakhiri Khutba

मौला हुसैन ने घोड़े को एड़ लगाई, घोड़ा छलांग लगाता हुआ मैदान-ए-कर्बला में उतर पड़ा। और जैसे ही यज़ीदियों को ललकारा, फिर एक आखिरी खुत्बा हुसैन इब्ने अली ने दिया। मौला हुसैन ने आखिरी खुत्बा दिया। वो खुत्बा ये था, हम्दो सलात के बाद आपने पुकार कर कहा, ऐ यज़ीद की तरफ से आने वाले लश्करियों क्या तुम मेरी हैसियत को नहीं जानते? 


Yazidiyon Par Imam Hussain Ki Takreer Ka Asar

अगर तुम्हें मालूम नहीं, तो अब भी बहुत सारे सहाबा हैं जिन्होंने रसूल की ज़ुबान से मेरी तारीफ़ में, मेरी फ़ज़ीलत में जो हदीसें सुनी हैं, बयान करेंगे, जाओ तुम उनसे सुन लो। सहाबा अब भी बाहयात हैं। क्या मैं फ़ातिमा का बेटा नहीं हूँ? क्या मैं हैदर-ए-कर्रार अली-ए-मुर्तज़ा का शहज़ादा नहीं हूँ? क्या रसूलुल्लाह ने मेरे लिए ये नहीं फरमाया कि हसन और हुसैन जन्नती जवानों के सरदार हैं? क्या तुम्हें मालूम नहीं, मेरे आका मेरे लबों के बोसे लिया करते थे, मेरी गर्दन को सूंघा करते थे। क्या मेरा खून तुम्हारे लिए हलाल है? 


Shimr Aur Amr Bin Saad Ki Bagawat Aur Imam Par Hamle

ये तकरीर इतनी लंबी हो गई, हुसैन इब्ने अली की इस आवाज़ पर यज़ीदियों में सन्नाटा छा गया। कई लोगों की आँखों से आंसू भी निकल पड़े। और यज़ीदियों में जब ये माहौल हुआ तो शिम्र ज़िल जौशन, अम्र बिन साद जो बदबख्त अज़ली थे उन्होंने भड़काना शुरू किया। और बीच तकरीर में ही इमाम के तीर बरसाना शुरू किया। हुसैन इब्ने अली रज़ियल्लाहु ताला अन्हु के दरमियाने तकरीर आपके लबों की तरफ तीर बरसाना शुरू किया। कहा कि बंद करो अब अपना बयान, तकरीर बंद करो, मुकाबले के लिए तैयार हो जाओ। 


Imam Hussain Ki Bahaduri Aur Yazidiyon Ka Qatl

इमाम हुसैन ने देखा कि ये अब किसी तरह बाज़ आना नहीं चाहते, मेरा खून पीकर के ही इन्हें सुकून मिलेगा, तो आपने फिर अपनी तलवार लहराई। जो सामने आता था उसे काटते चले गए। जो जिस तरह से आता था उसे कत्ल करते गए। हुसैन इब्ने अली इतनी मर्तबा खैमे की तरफ आते थे और अपनी बीवियों को देखते और फिर चले जाते थे। 


56 Saal Ke Imam Hussain Ki Karbala Mein Bebasi Aur Pyas

ये दोपहर का वक्त था, ज़ुहर का वक्त करीब आया और हुसैन इब्ने अली रज़ियल्लाहु ताला अन्हु... अंदाज़ा करें वो 56 साल की बुढ़ापे की उम्र है, जो 3 दिन से प्यासा है, 3 दिन से भूख की शिद्दत अलग है और फिर जो जवानों की लाशें उठाया वो अलग मसला है। मियां दो चार ईंटें उठाओ तो तुम्हारे कंधे दुखने लग जाएंगे। दो चार पत्थर उठाओ तो तुम्हारे हाथ में वर्म आ जाएंगे। हमने देखा है, और तन्हा हुसैन रज़ियल्लाहु ताला अन्हु ने एक दो नहीं, तकरीबन 40 लाशें उठाई दिन भर में। 


Imam Hussain Dwara Karbala Mein 40 Se Zyada Lashein Uthana

40 से ज्यादा लाशें उठाईं। बच्चों की अलग, जवानों की अलग, बूढ़ों की अलग। उन लाशों को उठा कर के वो बूढ़ा जिस्म क्या कमज़ोर नहीं हुआ होगा? प्यास अलग है, भूख अलग है, बीवियों का रोना अलग है, उन्हें बेबसी पर छोड़ कर आना ये गम अलग है। हम तो बेहाल हो जाएंगे, हम तो गमों से मर जाएंगे। इसीलिए सब्र-ए-हुसैन पर मैं समझता हूँ दुनिया का कोई शख्स पहुंच नहीं सकता। उस इस्तकामत पर कोई नहीं पहुंच सकता। 


Tanha Ali Ka Laal Aur Yazidiyon Ki Fauj

हुसैन इब्ने अली दोपहर के वक्त मौला हुसैन कर्बला के मैदान में घिर गए। तन्हा अली का लाल खारों में घिर गया, वो फ़ातिमा का लाडला हज़ारों में घिर गया। अब हुसैन इब्ने अली के मुताल्लिक जो मैंने शुरू में कहा था, फ़ातिमा के लाडले का आखिरी दीदार है। फ़ातिमा के लाडले का आखिरी दीदार है, हश्र का हंगामा बरपा है, मियाने अहले बैत दरमियाने अहले बैत। रसूलुल्लाह के इस शहज़ादे ने फिर ललकारा, लोगों को ललकारते रहे और कत्ल का ये बाज़ार गर्म था। अम्र बिन साद ने कहा, हुसैन ने तन्हा 50ओं लोगों को मार दिया, तुम तन्हा हुसैन को क्यों नहीं मार पाते? 


Kufa Se Hazrat Abdullah Ki Karbala Mein Aamad

हुसैन इब्ने अली रज़ियल्लाहु ताला अन्हु के मुताल्लिक एक रिवायत में ये भी बता दूं, मेरे अज़ीज़ो, उस हालत में भी हुसैन इब्ने अली ने सखावत का दरिया नहीं रोका था। आपकी शान ये थी कि अब्दुल्लाह नाम का एक शख्स कुफा का रहने वाला वो उस वक्त कुफा में नहीं था जब ये मारके सर हुए थे, वो 6 महीने कहीं तिजारत पर गया था। वापस आया तो उसने कुफा में देखा पूरा बाज़ार खाली है, घर खाली हैं, अपनी बेटियों से पूछा, क्या हो गया कुफा में सब दुकानें बंद हैं? सब घर में ताले लगे हुए हैं? 


Hazrat Abdullah Aur Yamani Aqeek Patthar Ka Waqia

उसकी बेटी ने कहा, सुना है हाकिम-ए-वक्त के खिलाफ किसी शख्स ने बगावत की है और उस बागी का सर कुचलने के लिए पूरे कुफा वाले गए हैं। अब्दुल्लाह कहता है मुझे मालूम नहीं था कौन सा बागी है, किसने बगावत की। और फिर उनकी बेटियों ने कहा अब्बा जान आप भी घर में न बैठें इसलिए कि हाकिम-ए-कुफा इब्ने ज़ियाद ने ऐलान किया है अगर कुफा में किसी घर में कोई जवान बाकी रहा और कर्बला नहीं गया, तो हम उसको तलवार से छलनी कर देंगे, कत्ल कर देंगे। तो अब्दुल्लाह कहता है मुझे डर था, मेरी जान का भी खौफ था कि अगर यहां रहते हुए पकड़ा गया तो मारा जाऊंगा, कहा ठीक है मैं भी जाता हूँ उस बागी के खिलाफ। 


Hazrat Abdullah Ka Karbala Ki Taraf Safar

उस बागी को मैं भी मुकाबला करके कत्ल कर सकता हूँ, देखूंगा। अपना घोड़ा लिया, तलवारें ली और निकलने लगा। बेटी ने कहा बाबा जान बहुत सारा लश्कर गया है उस बागी को कत्ल करने के लिए। आप भी उस लश्कर में मिल जाएं और सुना है जंग के बाद माले गनीमत हाथ आता है। माले गनीमत हाथ आता है जो भी माल मिलता है वो फौजियों में बांटा जाता है। बाबा जान मुझे यमनी अकीक पत्थर बड़ा पसंद है, यमन का अकीक पत्थर बड़ा पसंद है। अगर वो माले गनीमत में मिल जाए तो लेते आ जाना। 

Hazrat Abdullah Ka Karbala Ki Taraf Safar


Imam Hussain Ki Sakhawat Aur Hazrat Abdullah Ko Angoothi Dena

अब्दुल्लाह अपनी बेटी को रुखसत करके आया। वो कहता है दोपहर का वक्त था जब मैं कर्बला में पहुंचा ये दसवी मुहर्रम थी। मैंने देखा एक शख्स घोड़े पर बैठा है और उसके पीछे 40-50 लोग दौड़ रहे हैं, कोई इधर से आ रहा है कोई उधर से आ रहा है। मैंने लोगों में से कुफियों में से एक से पूछा कि एक ही आदमी है? तुमने कहा था बागियों की जमात है, एक ही आदमी है और 50-50 लोग उसके पीछे दौड़ रहे हैं? लोगों ने कहा हाँ वो तन्हा 50 पर भारी है। किसी के हाथ नहीं आ रहा। अकेला तो उसके सामने कोई जा ही नहीं सकता है। 


Hazrat Abdullah Ki Karbala Mein Shahadat

अब्दुल्लाह ने कहा मैंने ये सुन कर के अपना घोड़ा भी दौड़ा दिया कि चलो उस बागी को मैं भी देखता हूँ। अगर मेरी तलवार से वो कत्ल हो गया, अगर गिर गया, तो इनाम ओ इकराम मुझे भी मिल जाएगा। घोड़ा दौड़ाते हुए वो आया, हुसैन इब्ने अली को तन्हा ये यज़ीदी कुत्ते कभी इधर से दौड़ा रहे थे कभी उधर से दौड़ा रहे थे। तन्हा फ़ातिमा का लाल तलवार लहराता हुआ और लोगों से मुकाबला करता हुआ मैदान-ए-कर्बला में सरगरम है। 


Imam Hussain Ki Nabi Hone Ki Shaan

अब्दुल्लाह कहता है मैं पीछे घोड़े को दौड़ाता हुआ आया, मैं हुसैन इब्ने अली के घोड़े से सिर्फ दो हाथ के फासले पर रह गया था। हुसैन इब्ने अली पीछे मुड़ते हैं और कहते हैं अब्दुल्लाह और करीब आजा। अब्दुल्लाह और करीब आजा। मैं डर गया, ये कौन बागी है जो मेरा नाम भी जान रहा है? मेरा नाम जानता है। अब्दुल्लाह कहता है मुझे थोड़ी सी जिस्म में कपकपाहट हो गई, खौफ सा हो गया कि ये मुझे जानता कैसे है? कहीं मेरे पहचान वाला तो नहीं। मैं और आगे बढ़ गया। 


Yamani Aqeek Ki Angoothi Ka Ataa Hona

जैसे ही मेरा घोड़ा उसके घोड़े के करीब लगाया, हुसैन इब्ने अली ने अपनी उंगली से अंगूठी निकाल कर के कहा, जा तेरी बेटी ने यमनी अकीक जो मांगा था, उसे दे देना। इसमें नग जो लगा है वो यमनी अकीक का है। यमनी अकीक का नग लगा है। क्या तू अपने घर से निकल रहा था तेरी बेटी ने अकीक नहीं मांगा था? अब्दुल्लाह कहता है उसी दिन मुझे एहसास हुआ नबी क्या है नबी के शहज़ादे क्या हैं। नबी का इल्म कहां होगा? 


Hazrat Abdullah Ka Imam Hussain Par Fida Hona

मेरे अज़ीज़ो हुसैन इब्ने अली ने उस दिन भी सखावत के दरिया को रोका नहीं, अपनी अंगूठी निकालकर जैसे ही अब्दुल्लाह को दिया, उन्होंने अंगूठी जैसे ही लिया और सलाम किया, कहा मौला हुसैन अब अंगूठी लेकर जाने में क्या मज़ा है, मैं तो अपनी जान तुम्हारे कदमों पर निछावर करके जाऊंगा। यज़ीदियों से लड़ते लड़ते वो हज़रत अब्दुल्लाह भी वही कर्बला में शहीद हो गए। उनके हाथ में अंगूठी वैसी की वैसी रह गई। मौला हुसैन उस वक्त भी नवाज़ना नहीं छोड़ते हैं। अता करना नहीं छोड़ते हैं।


Imam Hussain Ke Gharane Ki Sakhawat

ये सखावत का घराना है, ये सखी लोगों का घराना है। उस घराने में इनकी परवरिश हुई है। जहां 5 दिन भूखे रहने के बाद भी अगर कोई फकीर आता तो उसे ये नवाज़ दिया करते थे। घर की सारी गिज़ाएं दे दिया करते थे। मौला हुसैन रज़ियल्लाहु ताला अन्हु उन यज़ीदियों के जत्थे में ऐसे घिर गए थे दोपहर का वक्त आया अचानक आपको एहसास हुआ जुम्मा का दिन है। आज पूरी दुनिया में मेरे नाना का खुत्बा पढ़ रहे होंगे लोग और जुम्मा की इमामतें हो रही होंगी। 


Jumma Ke Din Imam Hussain Ki Tanhai

हुसैन यहां पर तन्हा है, जुम्मा की नमाज़ भी नहीं हो रही है। मुसाफिर पर जुम्मा नहीं है लेकिन जुम्मा के वक्त का एहतराम तो करना ही चाहिए था। आपने उनसे कहा ऐ लोगों, हाँ मैं जानता हूँ मुसाफिर पर जुम्मा नहीं क्या इस वक्त का एहतराम भी नहीं करोगे? जंग बंदी नहीं कर सकते? जंग थोड़ी देर के लिए रोक नहीं सकते? कि इस वक्त का एहतराम बाकी रहे। इसी असना में आपने कहा दो रकात नमाज़ पढ़ने की इजाज़त मिल जाए। 


Imam Hussain Ki Aakhiri Khwahish: Do Rakat Namaz

अल्लाह अल्लाह हुसैन तुम्हारे सजदों को सलाम, दुनिया आज भी कत्ल होने वाले से आखिरी ख्वाहिश पूछती है। तो आखिरी ख्वाहिश लोग ये बताते हैं घर वालों से मिल लूंगा, फलां वसीयत कर दूंगा, ये जायदाद के पेपर देख लूंगा। हमारी वसीयतें हमारी ख्वाइशात दुनियावी होती हैं। मौला हुसैन ने आखिरी वक्त में अगर कोई तमन्ना की थी, दो रकात नमाज़ पढ़ने की। दो रकात नमाज़ पढ़ने की। यज़ीदियों ने कहा क्या आप नमाज़ पढ़ लें? 


Imam Hussain Ki Namaz Aur Yazidiyon Ka Hamla

घोड़े से ज़ुलजनाह से नीचे उतरे थे, मौला हुसैन रकात नमाज़ की बांध ली और बिल्कुल इत्मीनान और सुकून के साथ नमाज़ पढ़ते रहे। किसी का ख्याल नहीं किया, वो तलवारों की झनकार में भी खौफ नहीं था। कोई डर नहीं था। रुकू इत्मीनान से हो रहा है, सजदा इत्मीनान से हो रहा है। पहली रकात भी मुकम्मल हुई। दूसरी रकात में गए, अम्र बिन साद और शिम्र ज़िल जौशन ने पुकार कर के कहा, ऐ ज़ालिमों अब क्या देखते हो? ये अच्छा मौका है, इस हुसैन का खात्मा कर दो। यहीं पर इसका काम तमाम कर दो। 


Sajde Ki Halat Mein Imam Hussain Par Zulm

खौली बिन यज़ीद नाम का ज़ालिम बदबख्त अज़ली करीब आया और सरे इमाम हुसैन पर चढ़ गया। अल्लाह अल्लाह लोगों ने ये तक लिखा है आपके ज़ानू-ए-मुबारक पर जब सजदे में आदमी घुटने लगाता है, तो एक शख्स ने उनकी रान पर पैर रखा। दूसरा घुटना हुसैन इब्ने अली की पीठ पर रखा। घुटना रख कर के उनके ऊपर ज़ोर दिया। मौला हुसैन के सरे मुबारक जब सजदे में था, एक ज़ालिम वहशी ने अपनी तलवार से आपकी ज़ुल्फ़ों को हटाया। ज़ुल्फ़ों को हटाया, आपकी ज़ुल्फ़ें चेहरे का हाला बनाई हुई थीं, सजदे में गिरी हुई थीं। 


Imam Hussain Ki Shahadat Aur Zibh-e-Azeem

हुसैन इब्ने अली ने इनकी आहट पाकर के भी सजदे से सर नहीं उठाया। सर सरका इमाम का सजदे ही में रहा। यकीनन इमाम ने सोचा होगा अब सर उठाएं तो ज़ालिमों के लिए क्यों उठाएं? वो सर ही बेहतर है जो मौला के हुज़ूर झुक जाए। और इसी असना में मौला के हुज़ूर पहुंच जाए। एक ज़ालिम ने आपकी गर्दन पर तलवार रखी और ज़ोर से काट दिया। उस प्यासे इमाम को बिना पानी के, बिना किसी खाने के ज़बह कर दिया गया। वो ज़िब्ह-ए-अज़ीम है, मौला हुसैन तेरी शहादत पर लाखों सलाम। इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन। 


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✍️ Written By: Nasir Husain


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