कुरआन-ए-अज़ीम में अल्लाह ताआला यूं इरशाद फरमाता है। यहूद और नसारा तुमसे हरगिज़ राजी नहीं होंगे। और कुरआन ने जो कहा है वो हक़ है। यहूदी और ईसाई तुमसे कभी भी राजी नहीं हो सकते। हत्ता तत्तबि'अ मिल्लतहुम जब तक के तुम उनके दीन में दाखिल ना हो जाओ।
कुछ लोग दूसरों की रज़ा के लिए दूसरों की खुशी हासिल करने के लिए अपने आप को बदल लेते हैं। लेकिन आप क्या समझते हो? कि तुम्हारी जी हजूरी करने से कोई क़ौम राजी हो जाएगी। कुरआन कहता है वो राजी नहीं होंगे।
Siyasat Aur Hamari Zindagi Par Uska Asar
आज के इन हालात पर मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं। अल्लाह तबारक व ताआला ने कुरआन-ए-अज़ीम में जो फरमाया वो हमारे लिए बहुत बेहतरीन गाइडलाइंस हैं उसको सामने रख कर ही अपनी जिंदगी के फैसले लेने चाहिए। हालात जो पूरी दुनिया के चल रहे हैं मुसलसल आप देखते होंगे। वक्त की सुपर पावर कहलाने वाला अमेरिका किस तरह बार-बार धोखा देता है। वो सबको पता है। सुबह एक स्टेटमेंट है शाम में एक स्टेटमेंट है जो बोला उस पर कोई क़ाइम नहीं। और उनको बोलने वाली भी दुनिया खामोश है। क्योंकि बड़े लोग जुर्म करते हैं तो लगता है ये फैशन है। और छोटा आदमी थोड़ा सा फिसल भी जाए तो बहुत बड़ा गुनाह लगता है। बड़ी ताकतें जो कुछ करती हैं दुनिया उसको फैशन समझती है वो अगर नंगे नाचें तो फैशन है। और अगर वो बगैर कपड़े के भी आएं तो फैशन है। वजह ये है कि वो बड़े लोग हैं पैसे वाले लोग हैं।
हमारे एक साथी थे वो कहते थे कि बड़े घर में पीर साहब के घर में कोई पागल बच्चा भी पैदा हो तो उसको मज्जूब कहते हैं। राल टपक रही हो कुछ भी हो। क्योंकि बड़े घर का है। और छोटे घर का बच्चा थोड़ा इधर उधर फिसल भी जाए तो कहते हैं पागल हो गया है। तो ये दुनिया का मिजाज बना हुआ है बड़ी ताकतों के असर पर। लोग खामोश रहते हैं आज आपके सामने मैं यही अर्ज़ करना चाहता हूं। कि दुनिया की ताकतें अवाम पर बहुत असर करती हैं। बहुत ज्यादा असर करती हैं।
Awaam Par Siyasat Aur Kanoon Ka Control
आप ये सोचते होंगे। जब इलेक्शन आते हैं फैसले होते हैं अरे उससे हमारा क्या लेना देना। हम राजनीति में नहीं हैं हम पॉलिटिक्स में नहीं हैं हम सियासत में नहीं हैं। आप ये समझ कर के बैठते होंगे। लेकिन मेरे अज़ीज़ो हमारी जिंदगी पर सबसे ज्यादा असर करने वाली कोई चीज है तो वो सियासत है। वो पॉलिटिक्स है। आप चाहो या ना चाहो इस खेल का आप हिस्सा बन ही जाओगे। कल को जो ताकत इलेक्टेड हो कर बैठती है। अरे मियां वो हमारे जिंदगियों के रोज़ मर्रे के फैसले लिया करती है। आप समझ कर के चलो। बहुत सारे लोग कहते हैं मौलाना को क्या ज़रूरत है सियासत पे बात करने की। मियां हम भी तो दुनिया का एक हिस्सा हैं। और हम भी तो जिस जगह जी रहे हैं वहां तो सियासत ही है। कल को फैसला क़ाइम कर लिया जाएगा कि आपको सुबह इतने बजे उठना है इतने बजे सोना है पार्लियामेंट में फैसला हो चुका है तो हमारी जिंदगी पर असर करेगा कि नहीं करेगा। जो कुछ भी है आप ताजिर हैं छोटे से बिज़नेस करने वाले हैं। पार्लियामेंट में बैठ कर के कोई भी बिल पास हो गया कि एक लाख रुपये की आमदनी तुम्हारी हो रही है तो तुम्हें इतना टैक्स देना होगा इतना फलां देना होगा तुम्हारे बिज़नेस पर असर होगा कि नहीं होगा। तुम छोटे ही आदमी हो लेकिन सियासत का असर पूरी क़ौम के ऊपर हमेशा हुआ करता है।
आप हिस्सा नहीं हैं। आप इलेक्शन लड़ते भी नहीं हैं वोट देते भी नहीं हैं दूर रहते हैं। लेकिन मैं आपको बताता हूं आपका बच्चा होगा आप स्कूल भेजेंगे कि नहीं भेजेंगे। स्कूल की एजुकेशन पूरी कौन बनाता है पार्लियामेंट बैठ कर के बताती है। एक एजुकेशन बोर्ड होगा। पार्लियामेंट के ज़रिए से और उस एजुकेशन बोर्ड यानी एजुकेशन मिनिस्टर भी तो होता है। उसके अंडर में पूरे मुल्क के अंदर क्या सिलेबस चलना चाहिए ये सब डिसाइड होगा। तो जो वो डिसाइड करेंगे वही आपके बच्चे को पढ़ाना पड़ेगा। तो सियासत का असर आया कि नहीं आया। आप हजार दूर भागते हों। लेकिन आपको। कभी किसी से कोई भी मसला हो गया कोई तकरार हो गई चलें कुछ मसले ऐसे पेश आए केस हो गया कहां जाएंगे आप अदालत में जाएंगे। आपको कोर्ट में जाना है अदालत के पूरे जो आईन बने हुए हैं कानून बने हैं वो सियासत के असर में ही बने हुए हैं। आप इससे दूर नहीं जा सकते।
मैं ये सारी तम्हीद इसलिए अर्ज़ कर रहा हूं कि। दुनिया में जो भी ताकत पर बैठता है उसका असर अवाम पर होता है। अब इस तम्हीद को अगर समझ चुके हो तो आगे की बात सुनो गौर से बहुत ध्यान से किस लिए मैं कह रहा हूं। जब जब ताकत... बड़ी ताकत। हुकूमत पर बैठती है तो अवाम के रोज़ मर्राह की जिंदगी पर तो असर होता ही है। लेकिन साथ ही साथ अक़ीदे पर भी असर हो जाता है। ईमान पर भी असर होता है। इसलिए जब हुकूमत पर जब बड़ी ऐसी ताकतें आती हैं। जिनका अक़ीदा। बिल्कुल मुखालिफ हो तुम्हारे ईमान से उसके बावजूद उसका असर देखने को मिलता है अवामुन नास पर।
Taqat Aur Hukumat Ka Aqeede Par Hamla
अब जो हालात उभर कर के आ रहे हैं देखना मेरी बात को आप याद रखें मैं प्रेडिक्शन नहीं करता हूं। कोई भविष्यवाणी नहीं है। लेकिन दस्तूर ऐसा चला है मैं आपसे कह रहा हूं। कल को अगर। ईरान का दबदबा बढ़ता है। तो फिर जो हालात पेश आने वाले हैं मैं इसकी मुखालिफत में ये नहीं कह रहा हूं। वो नहीं होना चाहिए ये नहीं होना चाहिए। हजारों लाखों वो लोग होंगे। जो अपने अक़ीदे पर फिर से देखने पर मजबूर हो जाएंगे। अहले सुन्नत जमात के लिए एक बड़ा मसला भी होगा। ऐसे ही उससे सौ साल पहले जब सउदी में वहाबी हुकूमत क़ाइम हुई। पैसा ताकत सब कुछ उनके पास था। उलमा खरीदे गए किताबें छपाई गईं। जन्नतुल बक़ी को बुलडोजर से पूरा तहस नहस कर दिया गया। शिर्क के नाम पर बहुत सारी चीजों को खत्म किया गया तो ताकत थी हुकूमत आई। और एक दो नहीं हजारों लाखों की तादाद में उनके अक़ीदे की बोली बोलने वाले लोग पैदा हो गए। सिर्फ अवाम नहीं। उलमा भी। बड़े बड़े मुफ़्तियान-ए-किराम। जो मन्सबदार हैं वो सब दौलत के तहत में आ गए ताकत के तहत आ गए। ये दुनिया का मामूल है ये चलता रहेगा। कल को आप भी देखना जब कोई पावर में आएगा तो उसकी तरफ बहुत सारी क़ौम हो जाएगी। वो बहुत रेयर लोग हैं जो अपने ईमान पर क़ाइम रहते हैं। वो रसूलुल्लाह के दीवाने हैं।
मेरे आका सल्लल्लाहु ताआला अलैहि वसल्लम के सहाबा में उस वक्त। आपको बिल्कुल इस बात का ऑपोजिट आपको दिखाई देगा। इसका ऑपोजिट। हुजूर ने जब ईमान की दावत दी तो सबसे पहले आपके पास आने वाले सहाबा गरीब थे। बहुत गरीब थे। और ऐसा नहीं कि हुजूर-ए-पाक सल्लल्लाहु ताआला अलैहि वसल्लम का माल देख कर के वो आए थे। कि बड़ी ताकत के ये मालिक हैं बड़े दौलत के मालिक हैं इनके पास जाएं नहीं। उस रसूल के पास वो आए थे जो पेट पर पत्थर बांधा करता। वो सहाबा उस रसूल के पास आए थे। जो फाक़ा कशी को ज्यादा तरजीह देता। रसूले करीम सल्लल्लाहु ताआला अलैहि वसल्लम के साथ आ तो गए गरीब सहाबा। लेकिन उनके ऑपोजिट में कौन थे? अबू जहल बड़े पैसे वाला। अबू लहब बड़े पैसे वाला। सफवान बड़े पैसे वाला। इतने बड़े बड़े मालदार लोग वहां पर थे। जो ये पूरे सहाबा की अकेले कफालत कर सकते थे। सारे सहाबा को वो अकेले पाल सकते थे। अब यहां पर मैं आपको बताता हूं एक तरफ माल और पैसा और ताकत और कुव्वत है। और एक तरफ ये गरीब सहाबा की जमात है जो पीटी जा रही है मारी जा रही है।
Sahaba-e-Karam Ka Imaan Aur Jang-e-Khandaq Ka Waqia
सहाबा ने क्या किया? अल्लाहु अकबर वो मुझे बात याद आती है। खंदक के मौके पर। एक महीने से सहाबा खंदक खोद रहे थे। और जब जंग शुरू हुई। 12000 के करीब तादाद में मुशरिकीन आ गए। खंदक के उस पार। उनको पता नहीं था ये खंदक वाली जंग है मुशरिकीन को। ये सहाबा ने नया तरीका इख्तियार किया था मदीने की हिफाजत के लिए कि वो खंदक उबूर करके मदीने में ना आ जाएं। खैर। महीना गुज़र गया था खाने पीने की चीजें खत्म हो गई थीं। फ़ाक़े पर फ़ाक़ा चल रहा था। उस वक्त सामने वाली जो फौज थी। वहां से तो रोज़ गोश्त भुनने की खुशबुएं आती थीं। गरम रोटियां उधर पक रही थीं। वहां तो पैसा था माल था खाने की अफरात थी। सहाबा इधर भूखे हैं प्यासे हैं। लेकिन तारीख में आप खोल कर के देखो एक सहाबी ने भी रसूलुल्लाह से ये कहा हो। कि चलो उधर खाने की लज़ीज़ चीजें हैं जा कर खा कर के तो आएं। उस तरफ उन्होंने चेहरा तक नहीं किया। हुजूर-ए-पाक सल्लल्लाहु ताआला अलैहि वसल्लम ने उनसे कहा ऐ मेरे सहाबा मुझे पता है। वो गोश्त की खुशबुएं। तुम्हारी भूख को और बढ़ा देती होंगी। तुम्हारा सब्र टूटता होगा। सबर करो सहाबा ने क्या कहा या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु ताआला अलैहि वसल्लम। हम रोटी और बोटी के लिए इस जंग में आए होते तो यहां नहीं होते वहां होते। हम आए हैं सिर्फ चेहरे रसूल के लिए। हमारी भूख का इलाज है मुस्तफ़ा का चेहरा। हमारी बीमारियों का इलाज है मुस्तफ़ा का चेहरा। इस दीन से उन्होंने एक बाल बराबर भी बगावत नहीं की।
Gumrah Hukumat Aur Naye Firqo Ki Paidaish
लेकिन वो अवाम की बात है। कि जब जब ताकत किसी। ऐसे गुमराह के पास भी आ गई तो उसकी गुमराही की तारीफ करने वाली एक जमात पैदा हो जाएगी। हां एक जमात पैदा हो जाएगी। अरे दूर तो छोड़ो हमारे इस मुल्क में कुछ सालों पहले। एक कॉन्फ्रेंस हुई थी दिल्ली में। आपको पता नहीं होगा। उसमें बड़े बड़े उलमा और बड़े बड़े सूफियों को जमा किया गया था और कॉन्फ्रेंस कराने वाले कौन थे? कॉन्फ्रेंस कराने वाले मुल्क के प्राइम मिनिस्टर थे। मुसलमानों की सूफियों की खानकाहों की कॉन्फ्रेंस कराई गई थी ठीक है। उलमा भी उसमें शरीक हैं खानकाहों के गद्दी नशीन और गधे नशीन सब उसमें शामिल हैं। और। शुरू हो रही है कॉन्फ्रेंस। तो मुझे हैरत होती है क़सीदा पढ़ने वाला कोई मौलवी। क़सीदा पढ़ता है बादशाह की शान में। खुदा करे कि तेरी उम्र को उम्रे खिज्र अता हो। ये दुआ दी जा रही है। मैं ये कहता हूं मेरे अज़ीज़ो ये सारा मंज़र एक तरफ लेकिन जो मैं बात कह रहा हूं। ताकत और सियासत जब आ जाती है तो बहुत सारे लोगों के अक़ीदे पर भी असर पड़ता है। उस वक्त अपना अक़ीदा बचाना ये बहुत बड़ा चैलेंज होता है। आप क्या समझते हो ये जो फिरके पैदा हुए दीन में ये ताकत के असर से पैदा हुए हैं। जब सियासत पर हुकूमत पर कोई गुमराह बैठ जाता है तो वो अपना अक़ीदा सब पर थोपने की कोशिश करता है। मो'तज़ला की जमात आई मो'तज़ला एक फिरका है वो कुरआन को अल्लाह की मखलूक मानते थे। कि कुरआन फना हो जाएगा। बहुत सारे उनके अक़ीदे गुमराह थे जब वो पावर पर आए खलीफा बने या गवर्नर बने तो उन्होंने अवाम को और उलमा को ज़बरदस्ती अपना अक़ीदा थोपा। और एक दौर ऐसा आया कि उलमा उनके हिसाब से फतवा देने लगे। उनकी तारीफें करने लगे कि ये हक़ जमात वाले लोग हैं बादशाह-ए-आज़म उनकी तारीफ में क़सीदे पढ़े जाते थे।
Imam Ahmad Bin Hanbal Ka Waqia Aur Unka Sabar
लेकिन मेरे अज़ीज़ो पूरी पूरी क़ौम कभी गुमराह नहीं होती। हर ज़माने में हक्कानी उलमा और रब्बानी उलमा मौजूद रहते हैं। मो'तज़ला की जमात पावर में थी हुकूमत में थी ताकत उनके पास थी उलमा की जमात उनके पास थी लेकिन उसी ज़माने में हम देख रहे थे एक मर्दे कलंदर हज़रत सैय्यदना इमाम अहमद बिन हंबल को। इमाम अहमद बिन हंबल को बादशाह ने सौ (100) कोड़े मारे थे पीठ पर। और उसके बाद दूसरा आया उसने मारा फिर तीसरा आया उसने मारा। कोड़े किस तरह से मारे जाते थे उनकी रीढ़ की हड्डी झुक गई थी। इमाम हैं जिनको पांच लाख (5 लाख) हदीसें हुजूर की याद थीं। वो आम आदमी नहीं थे इमाम अहमद बिन हंबल जिनको रसूलुल्लाह की 5 लाख हदीसें याद थीं सिर्फ इसलिए कि वो ताकत और हुकूमत के तहत रह कर के उनकी बोली नहीं बोलना चाहते थे। इमाम अहमद बिन हंबल को एक बार कोड़े मारने के टाइम पे। उनके दोनों हाथ यूं जंजीर पर बांधे जाते थे और लुंगी पहने हुए होते थे। तहमद नंगी पीठ पर जल्लाद कोड़े मारता था। और जब मारे जा रहे थे एक दिन ऐसा भी हुआ कि आपकी लुंगी आपकी तहमद नीचे उतरने लग गई। ढीली हो गई। आपकी आंखों में आंसू आ गए। कि क्या मैं बे सतर हो जाऊंगा। एक आलिमे रब्बानी जो कोड़े खा रहा है शरीयते मुस्तफ़ा की हिफाजत के लिए। तहमद नीचे गिरने लगी। आपको रोना आ गया। कोड़ों के ज़ख्म से नहीं दर्द से नहीं तहमद के नीचे होने से। अचानक देखा गया दो हाथ ग़ैब से आए और उनकी तहमद को कस के बांध दिया। और जो आपकी आंखों में आंसू थे अचानक आप मुस्कुराने लगे जल्लाद पूछता है। कि हुआ क्या तुम तो अभी रो रहे थे और अभी हंसने लग गए हो। उसने अपने हाथ छोड़ दिए। इमाम कहते हैं तू अपना काम जारी रख। तू अपना काम जारी रख तुझे जो करने के लिए किया कहने के करने के लिए कहा गया है कर। इसलिए कि मैं जिसके लिए कोड़े खा रहा हूं वो हाथ मेरे पास आ चुके हैं।
Deen-e-Mustafa Par Qayam Rehne Ka Challenge
मेरे अज़ीज़ो। आज के बाद आपके साथ भी ये चीज आने वाली है। पावर और हुकूमत। इसलिए कि पिछले आप 10 साल पीछे जाएंगे तो एक जमात थी जो बार बार तब्लीग कर कर के तुमसे ये कहती थी मक्का में ऐसा है मदीने में ऐसे है। आप क्यों यहां अलग करते हो? मक्का और मदीने में पावर हुकूमत जिसके हाथ में है वो चाहते हैं कि पूरा का पूरा अपना अक़ीदा पूरी दुनिया पर थोपें। ऐसा नहीं होगा। पूरी दुनिया पर वही रंग गालिब आएगा जो मेरे मुस्तफ़ा ने पैदा किया है। तुम्हारा रंग नहीं गालिब आएगा तुम्हारी ताकत जब तक रहेगी तुम्हारा पैसा जब तक रहेगा भिखारी तुम्हारे मुरीद हो सकते हैं ईमान वाले लोग नहीं हो सकते। जिनकी पूरी जिनका पूरा ईमान ही दौलत है जिनका पूरा जीने का मकसद ही दौलत है उनके अक़ीदे से क्या सरोकार। वो कल को कुछ और होंगे आज को कुछ और होंगे। ये आपके लिए मैं पहले से बता रहा हूं आने वाले दौर में अगर कोई और बद अक़ीदगी फैलती है तो मेरे अज़ीज़ो आज से ही अपनी गठरियां बांध लो तेरी गठरी ताकी है और तूने नींद निकाली है। इसलिए ऐ सुन्नियों तुम्हारे लिए चैलेंज है। तुम्हारे लिए चैलेंज है।
आपको पता है। एक वक्त ऐसा भी आया था कि क़रामिता एक फिरका आया जिसने हजरे अस्वद भी चुरा लिया था। ख़ाने काबा से और वो ले के बहरैन चले गए थे। हजरे अस्वद को उनकी भी हुकूमत आई है मक्का और मदीने में। यज़ीद का दौर आया उसकी भी हुकूमत आई है मक्का और मदीने में। मक्का और मदीने में हुकूमत का आ जाना ये हक़ होने की दलील नहीं होती। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ये फरमाया हदीस है बसा औकात अल्लाह ताआला फासिक ओ फाजिर से भी अपने दीन का काम लेता है। उसके दीन का काम किसी फासिक ओ फाजिर से भी होता है। तो आपके लिए वो मेयार नहीं मेयार रसूलुल्लाह की मोहब्बत है। मेयार हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शरीयत है।
Akbar Badshah Ka Deen-e-Ilahi Aur Haqeeqat
अगर कभी कोई ऐसे ढकोसले लोग आएं जैसे यहां बादशाहों के दौर में भी ऐसी चीजें आई हैं। हिन्दुस्तान पर जब मुसलमान बादशाह आए। और कई बादशाहों ने दीन को अव्वल प्रायरिटी रखा और कुछ तो बे दीन थे कुछ उनका लेना देना ही नहीं था कुछ वो थे जो दीन बदलने पर तुले हुए थे। जैसे अकबर का नाम आता है। अकबर बादशाह के मुताल्लिक सुना होगा आपने। जलालुद्दीन अकबर उसको कहा जाता था इसकी हुकूमत लम्बे समय तक चलने वाली है तक़रीबन 48 साल तक शायद हुकूमत किया। और जब आदमी को नशा चढ़ जाता है हुकूमत का यहां 5 साल में ही चढ़ने लगता है वो तो 48 साल का था। और ये तो इलेक्शन से आने वाले हैं उनके हां तो इलेक्शन भी नहीं था तो नशा तो और ज्यादा होगा। एक दौर ऐसा आया कि उसके आस पास के चमचों ने कहा कि ये दीने इस्लाम पुराना हो गया हजार साल हो गए हैं। अब एक नया दीन होना चाहिए आपके हिसाब से आप बनाओ कहा तुम लोग बनाओ सारे लोग मिल कर के। तो वहां के फुज़ला खार जो थे वो सब तैयार हो गए पैसे लेंगे और बनाएंगे एक नया दीन बनाया गया। नया दीन क्या था अज़ान की जगह सीप बजाई जाएगी अज़ान नहीं सबको एक करना है सारे लोग एक ही जगह पर इबादत करेंगे। और मस्जिद भी होगी और मिंबर पर मंदिर भी होगी। वहां पर मूर्ति भी रखी जाएगी और मस्जिद में नमाज भी होगी ये दीने इलाही इसका नाम रखा गया और हद ये है मेरे अज़ीज़ो जो बात मैं कह रहा हूं। ताकत और सियासत का असर अवाम पर बहुत होता है हजारों और लाखों की तादाद में लोग उसके दीन को मानने भी लग गए। शुरुआत हो गई। कितने मौलवी भी शुरू हो गए कि हां एक मॉडर्निज्म है नयापन है होना चाहिए बादशाह ने कहा है तो सही है।
Mujaddid-e-Alf-e-Saani Ka Haq Ke Liye Sangharsh
लेकिन मैं ये बात कह रहा हूं ना हर ज़माने में गुमराह पूरे नहीं होते हक्कानी उलमा हर ज़माने में अल्लाह ताआला रखता है। एक मर्दे कलंदर अहमद फारूकी सरहिंदी मुजद्दिदे अल्फे सानी खड़े हुए। और उन्होंने उसकी तरदीद की और जगह जगह आपने अपने बयानों से इंकार किया कि दीने इलाही नहीं होगा दीने मुस्तफ़ा ही होगा। तुमने नाम रखा है दीने इलाही ये अल्लाह का दीन नहीं है ये बादशाह का बनाया हुआ दीन है। दीन वही है अल्लाह का जो मेरे नबी ले कर के आए थे। और उस दीन की खातिर जैसी बादशाह के खिलाफ बोलना आसान है? आसान है आप इनकी पॉलिसियों के खिलाफ बोलो अभी देखो उठा लेंगे आपको। हां। कहने को दुनिया में डेमोक्रेसी है आजादी है बोलने की आजादी फ्रीडम ऑफ स्पीच फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन पता नहीं क्या क्या चीजें हैं लेकिन वो सिर्फ और सिर्फ उनके कुत्तों के लिए है। उनके पाले हुए कुत्तों के लिए फ्रीडम है पूरा। और तुम कहीं से अभी देखो मैं कुत्ता ही बोल दूं तो फिर मुश्किल है। उठा लिया जाएगा नहीं तुम्हारे लिए नहीं है। हमारी तबीयत के हमारे पाले हुए लोगों के लिए वो जितना चाहें भौंकें। क्योंकि हमारे खिलाए हुए कुत्ते हैं हमारे पाले हुए कुत्ते हैं ये किसी को काट लें तो भी जायज़। किसी पर भौंकें तो भी जायज़। दुनिया का तक़रीबन सिस्टम यही है सब जगह। कहने को डेमोक्रेसी है। आजादी सब के लिए नहीं है। हां अगर इनके आलोचक हो कोई इनको क्रिटिसाइज़ करने वाला कोई हो अरे वो एक जुमला भी बोले तो उसको पकड़ लिया जाएगा। और डायरेक्ट नहीं पकड़ा जाए तो फिर तुम्हारे टैक्स की इन्क्वायरी शुरू हो जाए। माल कहां से आता है कितना कमाते हो कौन सा अकाउंट है ईडी हो आईटी हो सब जगह से बहर हाल।
दुनिया का ये निजाम है इन निज़ामो से ना डरते हुए भी अल्लाह के रब्बानी उलमा मौजूद रहते हैं मुजद्दिदे अल्फे सानी को 8 साल तक जेल में रखा गया था। सिर्फ अकबर के लाए हुए दीन की मुखालिफत करने की वजह से लेकिन हुआ क्या? अकबर मर गया उसका बेटा जहांगीर आया। और उसको जब बताया गया। कि जेल में मौजूद एक आलिम ऐसा है जो 8 साल में 700 कैदियों को आलिम बना दिया। वो वहां पर भी तब्लीग कर रहा है आज़ाद कराया गया और उसके बाद फिर उसी सुर्ख रुई के साथ इज़्ज़त के साथ मुजद्दिदे अल्फे सानी दीने मुस्तफ़ा का काम करके गए दुनिया से। हर ज़माने में ये होता रहेगा तो मैं ये कह रहा हूं जब ताकत किसी के पास आती है ऐसे गुमराह के पास तो शैतान उसके ज़रिए से पूरे दीन को खराब करने की कोशिश करता है और ऐसा ईसाइयों के साथ भी हुआ। यहूदियों के साथ भी हुआ। क्योंकि ईसाई पहले जो थे हक़ जो उलमा थे यहूदी भी। अरे वो अल्लाह तबारक वताआला की किताब तौरेत के मानने वाले थे मूसा अलैहिस्सलाम की शरीयत के क़ायल थे लेकिन जैसे ही किसी के पास पावर आया शैतान उसके सर पर सवार हुआ और उसके ज़रिए से गुमराहीयां शुरू कीं तो यहूदी उसके पैरोकार उसके तरफ चले गए ईसाइयों में भी ऐसा ही हुआ। दो तरीके से शैतान गुमराह करता है। एक सियासत के ज़रिए से और दूसरे उलमा के ज़रिए से। और ये दोनों का कॉम्बिनेशन होता है कैसे? सियासत जब पावर में होती है ताकत। हुकूमत वो खरीदती है कुछ उलमा को और उनके ज़रिए से। जो कहलाया जाता है वो अवाम पर उसका असर पैदा हो जाता है।